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BCom 1st Year Business Economics Income Demand Study Material notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Income Demand Study Material notes in Hindi

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BCom 1st Year Business Economics Income Demand Study Material notes in Hindi
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BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi

आय और माँग

(Income and Demand)

एक व्यक्ति कितनी वस्तुओं तथा सेवाओं का प्रयोग करता है, यह उसकी आय पर निर्भर करता है। यदि उसकी आय अधिक है तो उसकी क्रय-शक्ति अधिक होगी और उसकी माँग अधिक होगी। इसके विपरीत आय कम होने पर व्यक्ति की क्रय शक्ति कम होने के कारण उसकी माँग कम होगी। यहाँ पर क्रेता की आय का आशय उसकी व्यययोग्य आय (अर्थात् कुल आय – आय कर = व्यय योग्य आय) से होता है।

माँग की आय सापेक्षता या आय लोच (Income Elasticity of Demand)

जैसा कि बताया जा चुका है कि माँग पर उपभोक्ताओं की आय में परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। माँग की आय लोच आय में परिवर्तन के प्रत्युत्तर में माँग में परिवर्तन की मात्रा का माप है। इस प्रकार आय-परिवर्तनों के प्रति माँग की संवेदनशीलता को माँग की आय-लोच कहते हैं। स्टोनियर एवं हेग के शब्दों में, “माँग की आय-लोच किसी वस्तु की माँगी जाने वाली मात्रा में होने वाले आनुपातिक परिवर्तन और क्रेता की आय में होने वाले आनुपातिक परिवर्तन के बीच के अनुपात को व्यक्त करती है।” सरल शब्दों में, यह हमें यह दर्शाती है कि किसी व्यक्ति की आय में प्रतिशत परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी किसी वस्तु के लिये माँग में कितने प्रतिशत परिवर्तन होता है। इसके माप के लिये माँग में हुये आनुपातिक परिवर्तन को आय में हुए आनुपातिक परिवर्तन से भाग दिया जाता है। सूत्र रूप में :

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इस सम्बन्ध में यह बात स्मरणीय है कि साधारण परिस्थितियों में यह लोच सदैव धनात्मक होती है अर्थात् आय बढ़ने पर माँग बढ़ती है तथा घटने पर घटती है। किन्तु हीन वस्तुओं (गिफिन वस्तुओं) के सम्बन्ध में यह ऋणात्मक भी हो सकती है अर्थात् आय के बढ़ने के साथ-साथ इन वस्तुओं की माँग घटती जाती है। यह ध्यान रहे कि माँग की आय लोच पर विचार करते समय हम यह मान लेते हैं कि वस्तु की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

उदाहरण 12. जब एक उपभोक्ता की आय 3,000 रु० प्रति माह थी तो उसके परिवार में प्रति माह 45 लीटर दूध का सेवन होता था। उसकी आय बढ़कर 4,000 रु० प्रति माह हो गयी और उसके परिवार में दूध का सेवन 65 लीटर प्रति माह हो गया। उसकी माँग की आय लोच ज्ञात कीजिये।

When the income of a consumer was Rs. 3,000 per month, consumption of milk in his family was 45 litres per month. His income increases to Rs. 4,000 per month and consumption of milk increased to 65 litres per month. Calculate income elasticity of demand.

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(2) ऋणात्मक आय लोच (Negative Income Elasticity of Demand): जब उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर क्रय की जाने वाली वस्तु की माँग की मात्रा में कमी हो जाती है तब आय लोच ऋणात्मक होती है। ऐसा निम्न कोटि की वस्तुओं के सम्बन्ध में होता है। इसमें आय-माँग वक्र बायें से दायें नीचे की ओर गिरता जाता है। (रेखाचित्र 2.13 में देखिये)।

(3) धनात्मक आय लोच (Positive Income Elasticity) : उपभोक्ता की आय में वृद्धि होने पर जब माँग की मात्रा बढ़ जाती है तो उसे धनात्मक आय लोच कहते हैं। अधिकांश वस्तुओं के लिये आय लोच धनात्मक ही होती है। इसमें आय-माँग वक्र बायें से दायें ऊपर की ओर उठता हुआ होता है। (रखाचित्र 2.14 में देखिये) यह लोच निम्न तीन प्रकार की हो सकती है

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माँग की आय संवेदिता और माँग की आय लोच में अन्तर

(Difference between Income Sensitivity of Demand and Income Elasticity of Demand)

उपभोक्ता की आय में परिवर्तन के फलस्वरूप विभिन्न वस्तुओं की माँग पर प्रभाव के माप के लिये माँग की आय लोच की भाँति माँग की आय संवेदिता की अवधारणा का भी प्रयोग किया जाता है। अमरीका के वाणिज्य विभाग ने इस अवधारणा का प्रयोग किया है। यह व्यय-योग्य आय (Disposable Income) में प्रतिशत परिवर्तन के प्रत्युत्तर में किसी वस्तु विशेष पर किये जाने वाले व्यय का माप है। यह दो प्रकार की होती है : धनात्मक और ऋणात्मक। किसी वस्तु की आय संवेदिता धनात्मक तब कही जायेगी जबकि आय में वृद्धि से उस वस्तु विशेष पर व्यय में वृद्धि अनुपात से अधिक हो। ऐसा श्रेष्ठ वस्तुओं, जैसे दूध, फल आदि के सम्बन्ध में होता है। इसके विपरीत जब आय में वृद्धि से किसी वस्तु विशेष पर किये जाने वाला व्यय घटे तो उस वस्तु की आय संवेदिता ऋणात्मक कही जाती है। ऐसा निकृष्ट या हीन वस्तुओं के सम्बन्ध में होता है।

माँग की आय संवेदिता और आय लोच में थोड़ा अन्तर है। माँग की आय लोच उपभोक्ता की कुल आय में परिवर्तन के उत्तर में माँग की मात्रा के परिवर्तन का माप है जबकि माँग की आय संवेदिता उपभोक्ता की व्यय योग्य आय के परिवर्तन के उत्तर में किसी वस्तु विशेष पर किये जाने वाले व्यय में परिवर्तन का माप है। इस प्रकार माँग की आय संवेदिता, आय-लोच के माप का एक परिवर्तित रूप है। माँग की आय-लोच एक सकल अवधारणा है । जबकि आय-संवेदिता एक परिष्कृत अवधारणा है। माँग पूर्वानुमान में आय-संवेदिता अनुमानों का बहुत महत्व होता है।

माँग की आयलोच का महत्व

(Importance of Income Elasticity of Demand)

व्यवसाय में माँग की आय-लोच के विचार का बहुत महत्व है। यह विचार आय में घट-बढ़ का विभिन्न वस्तुओं की माँग पर पड़ने वाले आय प्रभावों (Income effects) के अनुमान लगाने में बहुत सहायक होता है। प्रत्येक बड़ा व्यवसायी यह जानने को इच्छुक रहता है कि उसकी वस्तु के विक्रय में वृद्धि देश के आर्थिक विकास की दर से अधिक होगी या कम। माँग की आय-लोच उसे उसके इस प्रश्न का उत्तर देती है। इस सम्बन्ध में दो सामान्य नियम निम्नलिखित हैं :

(1) यदि किसी वस्तु की माँग की आय-लोच शून्य से अधिक किन्तु इकाई से कम है तो उस वस्तु की माँग में वृद्धि देश के सामान्य आर्थिक विकास से धीमी रहेगी।

(2) यदि किसी वस्त की आय-लोच इकाई से अधिक है तो उस वस्तु की माँग में वृद्धि

देश के सामान्य आर्थिक विकास से अधिक तेज होगी। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं में भी सचेत नियोजित संसाधनों के वितरण (Conscious planned resource allocation) के लिये आय-लोच का विचार महत्वपूर्ण है। आर्थिक विकास की स्थिति में कुछ वस्तओं की माँग उसकी आय-लोच की भिन्नता के कारण अन्य वस्तुओं की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती है। यदि विभिन्न वस्तुओं की माँग की वृद्धि की इस भिन्नता के आधार पर उत्पादन मात्रा में वृद्धि नहीं की जाती है तो बाजार में कछ वस्तओं की कमी तथा मांग-जनित प्रसार की स्थिति देखने को मिलेगी। अतः एक नियोजित अर्थव्यवस्था में उत्पादन के नियोजन के लिए विभिन्न वस्तओं की माँग की आय लोचों के सही अनुमानों का पता लगाना आवश्यक हो जाता है जिससे अधिक आय-लोच वाली वस्तुओं का उत्पादन उनकी सम्भावित माँग के अनुरूप किया जा सके।

माँग की आय लोच की सीमायें (Limitations of Income-Elasticity of Demand) :

यद्यपि माँग पर आर्थिक क्रियाशीलता में परिवर्तन के प्रभावों के पूर्वानुमान में आय-लोचों का ज्ञान उपयोगी रहता है, किन्तु इस पूर्वानुमान की सीमायें निम्नलिखित हैं :

(1) माँग और आय परिवर्तनों के बीच सम्बन्ध सदैव स्पष्ट और सरल नहीं होता । आय में परिवर्तन की आकस्मिकता या अस्थिरता इस सम्बन्ध को पर्याप्त रूप से प्रभावित करती है। आय में परिवर्तन तथा माँग में परिवर्तन के बीच बहुधा समय भी लगता है।

(2) विक्रय पर आय के अतिरिक्त अन्य कारकों का प्रभाव पड़ता है।

(3) यह भी सम्भव है कि भूतकालीन सम्बन्ध भविष्य में सही न उतरें।

(4) इस विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण समस्या ‘आय’ शब्द के अर्थ के सम्बन्ध में भी उत्पन्न होती है। इस शब्द को निम्नांकित अर्थों में प्रयोग में लाया जाता है :

() पति व्यक्ति व्यक्तिगत प्रयोगयोग्य आय (Personal disposable income per head) : यदि किसी वस्तु का प्रयोग सभी व्यक्ति अलग-अलग करते हैं तो इस अवधारणा का प्रयोग किया जाता है। यही सर्वाधिक प्रचलित अवधारणा है। इसे करोपरान्त व्यक्तिगत आय में जनसंख्या का भाग देकर ज्ञात किया जाता है।/ 033

() प्रतिपरिवार व्यक्तिगत प्रयोगयोग्य आय (Personal disposable income per | family) : यदि किसी वस्तु का उपयोग सम्पूर्ण परिवार द्वारा मिल का किया जाता है, जैसे टेलिविजन, फ्रिज आदि तो इस अवधारणा का प्रयोग किया जायेगा।

माँग की आड़ी लोच

(Cross Elasticity of Demand)

माँग की आड़ी लोच का प्रतिपादन मूर ने किया किन्तु इस विचार की वैज्ञानिक व्याख्या राबर्ट ट्रिफिन ने की। माँग की आड़ी लोच का सम्बन्ध ऐसी वस्तुओं की माँग के माप से होता है जो कि एक दूसरे से किसी न किसी रूप में सम्बन्धित होती हैं। ऐसी वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं : स्थानापन्न वस्तुएँ तथा पूरक वस्तुएँ।

स्थानापन्न या प्रतियोगी वस्तुएँ (Substitutes or Rivals) : ये वे वस्तुएँ होती हैं जिन्हें एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है, जैस बूरा और चीनी, चाय और कॉफी आदि। इस प्रकार की वस्तुओं में एक वस्तु की माँग में परिवर्तन दूसरी वस्तु की माँग में विपरीत दिशा में परिवर्तन लाता है तथा यह परिवर्तन पहली वस्तु की लागत पर होता है। दूसरे शब्दों में. यदि दो स्थानापन्न वस्तुओं में से किसी एक वस्तु की मांग बढ़ती है तो दूसरी वस्तु की माँग घट जायेगी। ध्यान रहे कि दो स्थानापन्न वस्तुओं में से किसी एक वस्तु के मूल्य में परिवर्तन दूसरी वस्तु की माँग को उसी दिशा में प्रभावित करता है। उदाहरण के लिये यदि कॉफी के मूल्य बढ़ जाते हैं तो इसकी माँग घट जायेगी तथा चाय की माँग बढ़ जायेगी।

पूरक वस्तुएँ (Complementariness) : जब दो या अधिक वस्तुएँ एक साथ प्रयोग में लायी जाती हैं तो वे पूरक वस्तुएँ कहलाती हैं, जैस पैन और स्याही, डबल रोटी और मक्खन

आदि। इस प्रकार की वस्तुओं में किसी एक वस्तु की माँग में परिवर्तन से दूसरी वस्तु की माँग में परिवर्तन उसी दिशा में होता है किन्तु एक वस्तु के मूल्य परिवर्तन का दूसरी वस्तु की माँग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिये डबल रोटी के मूल्य बढ़ जाने पर इसकी माँग कम हो जायेगी तथा जिसके फलस्वरूप मक्खन की मांग भी कम हो जायेगी।

माँग की आडी लोच का आशय (Meaning of Cross Elasticity of Demand) : किसी एक वस्तु की माँग में वह परिवर्तन जो दूसरी वस्तु की कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप आ जाता है उसे पहली वस्तु की माँग की आड़ी लोच, तिर्यक लोच, परिगामी लोच, स्थानापन्न लोच या भेदक लोच कहते हैं। माना कि X और Y दो सम्बन्धित वस्तुएँ हैं। यदि हम X वस्तु की Y के सम्बन्ध में माँग की आड़ी लोच ज्ञात करना चाहते हैं तो हम Y वस्तु के मूल्य में परिवर्तन का X वस्तु की माँग में परिवर्तन पर प्रभाव का माप करेंगे। दूसरे शब्दों में, X वस्तु की Y से सम्बन्धित वस्तु की माँग की स्थानापन्न लोच को जानने के लिये निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है :

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(1) यदि दो वस्तुएँ एक दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न (Perfect substitutes) हैं तो उनके बीच प्रतिस्थापन की दर समान रहेगी। इनकी लोच अनन्त कही जाती है। ऐलन के अनुसार पूर्ण स्थानापन्नों की मान्यता एक काल्पनिक स्थिति है क्योंकि वास्तविक जीवन में पूर्ण स्थानापन्न वस्तुएँ नहीं पायी जातीं। यदि कोई वस्तुएँ पूर्ण स्थानापन्न हैं तो उन्हें एक ही वस्तु मान लिया जाता है।

(2) वास्तविक जीवन में ऐसी वस्तुएँ पायी जाती हैं जो कि बहुत निकट या अच्छी स्थानापन्न (Close or good A substitutes) हों। ऐसी वस्तुओं की माँग की आड़ी लोच इकाई से अधिक होती है। इन वस्तुओं में सीधा या धनात्मक सम्बन्ध होता है। उदाहरण के लिये जब कॉफी के मूल्य बढ़ जाते हैं तो चाय की माँग बढ़ जायेगी। इसी तरह यदि कॉफी के मूल्य घट जाते हैं तो चाय की माँग घट जाती है।

इस सम्बन्ध को रेखाचित्र 2.19 पर प्रदर्शित किया गया है। चित्र में DD रेखा चाय की माँग रेखा है। यदि कॉफी काचित्र 2.19 OP, हो जाता है तो चाय की माँग बढ़कर OQ के बराबर हो जाती है और यदि कॉफी का मूल्य घटकर OP, हो जाता है तो चाय की माँग घट कर OQ, के बराबर रह जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि स्थानापन्न वस्तुओं के मूल्य और उनकी मॉग के बीच सीधा या धनात्मक सम्बन्ध रहता है। अतः यदि दो वस्तुओं की माँग की आड़ी लोच की संख्या धनात्मक दी हुई है तो ऐसी वस्तुएँ एक दूसरे की प्रतियोगी या स्थानापन्न होंगी तथा यह संख्या जितनी अधिक होगी, वे वस्तुएँ उतनी ही एक दूसरे की अधिक निकट की स्थानापन्न होंगी।

(3) संयुक्त माँग या पूरक वस्तुओं की दशा में प्रमुख वस्तु की कीमत में परिवर्तन से पूरक वस्तु की माँग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। दूसरे शब्दों में, पूरक वस्तुओं के सम्बन्ध में मांग की आडी लोच का अंक ऋणात्मक होगा। उदाहरण के लिये यदि पैन की कीमत बढ़ जाती है | तो पैन की माँग घट जायेगी जिसके फलस्वरूप स्याही की माँग स्वतः ही कम हो जायेगी। इसी तरह यदि पैन की कीमत बढ़ जाती है तो इसकी माँग घट जायेगी जिसके फलस्वरूप स्याही की माँग भी घट जायेगी। इस सम्बन्ध को रेखाचित्र 2.20  पर प्रदर्शित किया गया है। चित्र में DD रेखा स्याही की माँग प्रदर्शित कर रही है।

प्रारम्भ में पैन का मूल्य OP है। इस पर स्याही की माँग OQ के बराबर है। किन्तु जब पैन का मूल्य बढ़कर OP, हो जाता है तो स्याही की माँग घटकर OQ, रह जाती है और जब पैन का मूल्य घटकर OP, हो जाता है तो स्याही की माँग बढ़कर OQ, के बराबर हो जाती है। अतः यदि दो वस्तुओं की ऋणात्मक आड़ी लोच दी हुई है तो हम कह सकते हैं कि ये वस्तुएँ पूरक वस्तुएँ हैं, न कि प्रतियोगी। आड़ी लोच का यह अंक जितना अधिक होगा, वे वस्तुएँ उतनी ही अधिक निकट की पूरक वस्तुएँ होंगी।

(4) यदि माँग की आड़ी लोच का अंक शून्य है तो इसका यह अर्थ हुआ कि वस्तुएँ न तो एक-दूसरे की स्थानापन्न वस्तुएँ हैं, और न पूरक वस्तुएँ, बल्कि वे स्वतन्त्र या अनाश्रित (Independent) वस्तुएँ हैं।

उदाहरण 15. बाजार में अ और ब दो वस्तुएँ हैं। जब अ वस्तु का मूल्य 6 रु० था तो उसकी माँग 15 इकाई थी। जब ब वस्तु का मूल्य 10 रु० था तो उसकी माँग 20 इकाई थी। बाद में ब वस्तु का मूल्य बढ़कर 15 रु० हो जाता है तथा अ वस्तु का मूल्य अपरिवर्तित रहता है लेकिन उसकी माँग बढ़कर 20 इकाई हो जाती है। दोनों वस्तुओं की तिर्यक लोच ज्ञात करो तथा उनके बीच सम्बन्ध की प्रकति स्पष्ट करो।

There are two products in the market, A and B. When the price of A was Rs. 6, the quantity demanded was 15 units. When the price of B was Rs. 10, the quantity demanded was 20. Later on the price of B rose to Rs. 15 and the price of A remained constant but its demand rose to 20 units. Determine the cross-elasticity of the two products and state the nature of relationship between the two.

उदाहरण 16. बाजार में अ और ब दो वस्तुएँ हैं। जब अ वस्तु का मूल्य 6 रु० था तो उसकी माँग 15 इकाई थी। जब ब वस्तु का मूल्य 10 रु० था तो उसकी माँग 20 इकाई थी। बाद में ब वस्तु का मूल्य बढ़कर 15 रु० हो जाता है तथा अ वस्तु का मूल्य अपरिवर्तित रहता है लेकिन उसकी माँग घटकर 10 इकाई हो जाती है। दोनों वस्तुओं की तिर्यक लोच ज्ञात करो तथा उनके बीच सम्बन्ध की प्रकृति स्पष्ट करो।

There are two products in the market, A and B. When the price of A was Rs. 6, the quantity demanded was 15 units. When the price of B was De 10 the quantity demanded was 20. Later on the price of B rose to Rs. 15 and the price of A remained constant but its demand fell to 10 units. Determine the cross elasticity of the two products and state the nature of their relationship

Solution :

चूँकि दोनों वस्तुओं के बीच आड़ी लोच ऋणात्मक है, अतः ये दोनों वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। –

उदाहरण 17. बाजार में अ और ब दो वस्तुएँ हैं। जब अ वस्तु का मूल्य 6 रु० था तो उसकी माँग 15 इकाई थी। जब ब वस्तु का मूल्य 10 रु० था तो उसकी माँग 20 इकाई थी। बाद में ब वस्तु का मूल्य बढ़कर 15 रु० हो जाता है किन्तु अ वस्तु का मूल्य और उसकी माँग अपरिवर्तित रहते हैं। दोनों वस्तुओं के बीच सम्बन्ध ज्ञात करो।

There are two products in the market, A and B. When the price of A was Rs. 6, the quantity demanded was 15 units. When the price of B was Rs. 10, the quantity demanded was 20. Lateron the price of B rose to Rs. 15 but the price and the demand of A remained constant. Find out the relationship between the two products.

Solution :

चूँकि दोनों वस्तुओं के बीच आड़ी लोच शून्य है, अतः स्पष्ट है कि दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं है। दोनों वस्तुएँ स्वतंत्र या अनाश्रित हैं।

उदाहरण 18. निम्न दशाओं में माँग की लोच की प्रकृति लिखिये और साथ ही उसका अंकीय माप भी दीजिये :

(अ) रेफ्रीजरेटर का मूल्य 300 रु० घट जाता है लेकिन माँग यथावत रहती है।

(ब) चाय का मूल्य 5% घट जाता है और कॉफी की माँग 10% घट जाती है।

(स) मक्खन का मूल्य 5% बढ़ जाता है और डबल रोटी की माँग 10% घट जाती है।

(द) एक उपभोक्ता की आय 10% बढ़ जाती है और उसकी फलों की माँग 50% बढ़ जाती है।

State the nature of elasticity of demand in the following cases and give the numerical measures also:

(a) The price of refrigerator falls by Rs. 300 but the demand remains the same.

(b) The price of tea falls by5% and the demand for coffee falls by 10%.

(c) The price of butter rises by 5% and the demand for bread falls by 10%.

(d) The income of a consumer rises by 10% and his demand for fruits rises by 50%.

Solution :

(अ) इस दशा में, माँग की लोच की प्रकृति ‘माँग की कीमत लोच’ है क्योंकि इसमें एक वस्तु रिफ्रीजरेटर) के मूल्य में परिवर्तन के प्रत्युत्तर में उसी वस्तु की माँग में परिवर्तन के सम्बन्ध में बताया गया है।

माँग की आड़ी लोच का महत्व (Importance of Cross Elasticity of Demand) . माँग-विश्लेषण में माँग की आड़ी लोच का विचार पर्याप्त महत्वपूर्ण है। यह विचार ही स्थानापन्न और पूरक वस्तुओं के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट करता है। यह विचार ही आधुनिक आंशिक या सामान्य साम्य विश्लेषण (Partial or General Equilibrium Analysis) का आधार है। विभिन्न बाजारों तथा वस्तओं और सेवाओं की बाजार रचना का वर्गीकरण तथा मूल्य निर्धारण एक विक्रेता के सम्बन्ध में माँग की आड़ी लोच की अवधारणा पर आधारित है। पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत विभिन्न विक्रेताओं की वस्तुओं की माँग की आड़ी लोच अनन्त होती है। इसीलिये इसमें वस्तुएँ एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न होती हैं। इसीलिये कोई एक अकेला विक्रेता बाजार मूल्य को प्रभावित नहीं कर पाता है। भेदात्मक प्रतियोगी बाजारों में प्रतियोगिता की गहनता अथवा एकाधिकार की मात्रा का मोटा अनुमान विभिन्न विक्रेताओं की वस्तुओं के लिये माँग की आड़ी लोच के माप द्वारा ही लगाया जाता है। यह लोच जितनी कम होगी, एकाधिकारी शक्ति उतनी ही अधिक होगी। अमरीका व इंग्लैंड में यह अवधारणा एकाधिकार विरोधी कानून के प्रवर्तन में पर्याप्त उपयोगी सिद्ध हुई है।

माँग की मूल्य लोच और आगम (Price Elasticity of Demand and Revenue)

एक प्रबन्धक के लिये माँग की लोच और आगम के बीच सम्बन्ध का ज्ञान अति महत्वपूर्ण है। आगम का आशय किसी फर्म या उत्पादक की उन प्राप्तियों से है जो उसे अपनी विक्रय से मिलती है। आगम तीन प्रकार का होता है –

(1) औसत आगम

(2) कुल आगम

(3) सीमान्त आगम

औसत आगम (Average Revenue) – यह वस्तु की एक निश्चित मात्रा के विक्रय से प्राप्त प्रति इकाई धन राशि होती है। विक्रय से प्राप्त कुल धन राशि को विक्रय की गई वस्तु की कुल मात्रा से भाग देने पर प्राप्त परिणाम को औसत आगम कहते हैं। सूत्र रूप में –

Total Revenue (TR) Average Revenue (or AR) = Total Quantity Sold (0)

औसत आगम के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं :

(1) औसत आगम तथा वस्तु का मूल्य एक ही बात है। यदि वस्तुएँ एक ही मूल्य पर बेची जाती हैं तो मूल्य और औसत आगम एक ही होंगे।

(2) औसत आगम रेखा ही माँग रेखा होती है।

(3) अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आगम रेखा नीचे को गिरती है और पूर्ण प्रतियोगिता में वह एक पड़ी रेखा के रूप में होती है।

कुल आगम (Total Revenue) : कुल आगम का आशय उस राशि से है जो एक निश्चित मात्रा की बिक्री से फर्म को प्राप्त होता है। कुल बेची गई इकाइयों को प्रति इकाई विक्रय-मूल्य से गुणा करके कुल आगम की गणना की जाती है। सूत्र रूप में –

Total Revenue (or TR) = Qty. Sold (or Q) x Price (or P)

सीमान्त आगम (Marginal Revenue) – वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के विक्रय से कुल आगम में जो वृद्धि होती है, उसे सीमान्त आगम कहते हैं। बीजगणितीय भाषा में उत्पादन की किसी मात्रा ‘N’ इकाइयों के कुल विक्रय आगम से N-1 इकाइयों के विक्रय आगम को घटाकर प्राप्त राशि nth इकाई का सीमान्त आगम कहलाएगा। एक दूसरे रूप में, N इकाइयों के स्थान पर N+1 इकाइयों के विक्रय से कुल आगम में होने वाली वृद्धि सीमान्त आगम कहलायेगी।

माँग की मूल्य लोच का सीमान्त आगम कुल आगम से सम्बन्ध (Relation of Price Elasticity of Demand with Marginal Revenue and Total Revenue) : सामान्यतया प्रत्येक फर्म का उद्देश्य अपने कुल आगम को अधिकतम करना होता है। अतः वह यह जानना चाहेगी कि विक्रय मूल्य के बढ़ाने या घटाने पर उसका यह उद्देश्य पूरा होगा या नहीं। वस्तुतः इसका सही उत्तर उसके मूल्य के विभिन्न स्तरों पर उसके उत्पाद की माँग की मूल्य लोच का गुणक (Coefficient of elasticity of demand) ही बतला सकता है जिसका सार निम्न है :

(1) जब माँगअधिक लोचदारहै (अर्थात् ep> 1) तो सीमान्त आगम धनात्मक होगा और मूल्य (औसत आगम) घटने पर कुल आगम बढ़ेगा क्योंकि इस स्थिति में माँग में वृद्धि मूल्य के घटने से अधिक अनुपात में होगी। इसी तरह मूल्य बढ़ने पर कुल आगम घटेगा क्योंकि इस स्थिति में वस्तु की मॉग अनुपात से अधिक घट जायेगी।

(2) जब किसी वस्तु की माँग ‘इकाई लोचदार’ है (अर्थात् e = 1) तब सीमान्त आगम शून्य होता है और मूल्य (औसत आगम) में परिवर्तन होने पर कुल आगम में परिवर्तन नहीं होगा क्योंकि इस स्थिति में मूल्य परिवर्तन का वस्तु की माँग पर ठीक विपरीत अनुपात में परिवर्तन होता है।

(3) जब किसी वस्तु की माँग ‘कम लोचदार’ है (अर्थात् e, <1) तो सीमान्त आगम ऋणात्मक होगा और मूल्य (औसत आगम) के गिरने पर कुल आगम गिरेगा तथा मूल्य के बढ़ने पर कुल आगम बढ़ेगा। इन सम्बन्धों को पृष्ठ A 52 पर दी गई सारणी से तैयार किये गये पृष्ठ 53 पर दिये रेखाचित्र 2.21 पर प्रदर्शित किया गया है।

(4) जब माँग पूर्णतया बेलोच हो (अर्थात् e = 0) तो मूल्य के घटने-बढ़ने पर वस्तु की माँग अपरिवर्तित रहती है जिसके कारण मूल्य बढ़ने पर कुल आगम बढ़ता है तथा मूल्य घटने पर कुल आगम घटता है।

(5) पूर्णतया लोचदार माँग की स्थिति में (अर्थात् जब e= 0 हो) मूल्य के बढ़ने पर कुल आगम घटकर शून्य तक हो सकता है तथा मूल्य घटने की स्थिति में इसमें असीमित मात्रा में वृद्धि आ सकती है।

माँग की लोच और औसत आगम के कुल आगम से सम्बन्ध को संक्षेप में निम्न सारणी में दिखलाया गया है :

माँग की लोच और कुल आगम

औसत आगम, सीमान्त आगम तथा माँग की लोच में सम्बन्ध (Relationship Amongst Average Revenue, Marginal Revenue and Elasticity of Demand) : उत्पादन के किसी स्तर पर औसत आगम, सीमान्त आगम और माँग की लोच के बीच सम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। श्रीमती जॉन रोबिन्सन ने अपनी पुस्तक “The Economics of Imperfect Competition” में फर्म के उत्पाद की माँग की लोच के माध्यम से औसत आगम और सीमान्त आगम में सम्बन्ध प्रकट करने के लिये निम्न गणितात्मक सूत्र का प्रतिपादन किया है :

Where, AR = Average Revenue

MR = Marginal Revenue

e = Price Elasticity of Demand उ

पर्युक्त समीकरणों से स्पष्ट है कि यदि हमें औसत आगम (AR), सीमान्त आगम (MR) और माँग की मूल्य लोच (e) में से किन्हीं दो के मूल्य ज्ञात हों तो तीसरे का मूल्य ज्ञात किया जा सकता है।

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सैद्धान्तिक प्रश्न

(Theoretical Questions)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

(Long Answer Questions)

1 माँग की लोच का क्या अभिप्रायः है ? व्यापार में इसका क्या उपयोग है ?

What is meant by elasticity of demand ? What is its use in business?

2. ऐसे माँग वक्र खींचिये जिनके सभी बिन्दुओं पर माँग की लोच वही हो।

Draw demand curves that have the same elasticity of demand at all points.

Hints : (1) When demand curve is a horizontal line parallel tox – axis, i.e., e= 0. (2) When demand curve is a vertical line parallel to y-axis, i.e., e= 0. (3) When demand curve is of the shape of rectangular hyperbola. Here

ep = 1 at all points of demand curve.

3. माँग की लोच से आप क्या समझते हैं ? इसे कैसे मापा जाता है ? माँग की लोच को निर्धारित करने के कौन-कौन से सिद्धान्त हैं ?

What is meant by Elasticity of Demand’ ? How do you measure it ? What are the principles determining the elasticity of demand ?

4. माँग की लोच क्या है ? माँग की लोच के प्रकारों एवं इसे प्रभावित करने वाले तत्वों का वर्णन कीजिये।

What is elasticity of demand ? Discuss the types of elasticity of demand and the factors affecting it.

5. माँग की लोच से क्या तात्पर्य है ? इसको प्रभावित करने वाले तत्वों का वर्णन कीजिये।

What do you mean by elasticity of demand ? Describe the factors up on which it depends.

6. माँग की मूल्य लोच को समझाइये और इसके विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिये। व्यावसायिक निर्णयों में माँग की मूल्य लोच की भूमिका की व्याख्या कीजिये।

Discuss the price elasticity of demand and explain its various types Explain the role of price elasticity in business decisions.

7. माँग की लोच से क्या तात्पर्य है ? उपयुक्त उदाहरण द्वारा समझाइये कि एक फर्म की मूल्य नीति को माँग की लोच किस प्रकार निर्धारित करती है ?

What is meant by Elasticity of Demand ? Explain giving a suitable illustration, how Elasticity of Demand determines the price policy of a firm.

8. माँग की लोच के विचार को स्पष्ट रूप से समझाइये तथा बताइये कि किसी वस्तु के मल्य निर्धारण में इसका क्या प्रभाव पड़ता है ?

Explain clearly the concept of Elasticity of Demand’ and show its effect on determination of value of a commodity.

9. माँग की लोच की परिभाषा दीजिये। माँग की लोच तथा माँग रेखा के ढाल में क्या सम्बन्ध है ?

Define the term “price elasticity of demand’. What is the relation between elasticity of demand and the slope of the demand curve ?

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