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BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi : Meaning and definition of Demand The Concept of Elasticity of demand Kinds of Elasticity of demand Price elasticity of demand Degrees or types of Elasticity of demand Measurement of Elasticity of Demand Relationship between Elasticity of Demand and Slope of Demand Curve Factors Determining Elasticity of Demand  Practical Utility of Elasticity of Demand

BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi
BCom 1st Year Business Economics Elasticity Demand Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Introduction Business Economics Study Material Notes in Hindi

माँग की लोच

(Elasticity of Demand)

माँग का आशय और परिभाषा

(Meaning and Definition of Demand)

अर्थशास्त्र में माँग शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। माँग से हमारा आशय एक दी हुई वस्तु की उन विभिन्न मात्राओं से होता है जिन्हें उपभोक्ता एक बाजार में किसी दिये हुये समय में विभिन्न मूल्यों पर क्रय करते हैं।

प्रो० बेनहम के शब्दों में, “किसी दिये हुए मूल्य पर किसी वस्तु की माँग वस्तु की वह मात्रा है जो उस मूल्य पर एक निश्चित समय में क्रय की जाती है।

प्रो० मेयर्स के शब्दों में, “किसी वस्तु की माँग उन मात्राओं की सारणी होती है जिन्हें क्रेता एक समय-विशेष पर सभी सम्भव मूल्यों पर क्रय के लिये तैयार रहता है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि माँग के लिये निम्न बातों का होना आवश्यक है :

(1) प्रभावपूर्ण इच्छा : इच्छा मानव मन की कामना को कहते हैं। सभी इच्छायें माँग नहीं कहलातीं। पेन्सन के शब्दों में, “अर्थशास्त्र में केवल प्रभावपूर्ण इच्छा को ही माँग कहते हैं।” किसी वस्तु के लिये इच्छा प्रभावपूर्ण तब कहलायेगी जबकि निम्न तीन बातें विद्यमान हों :

(अ) वस्तु के लिये इच्छा,

(ब) इच्छा को पूरा करने के लिये पर्याप्त साधन (अर्थात् द्रव्य) और

(स) साधन को व्यय करने की तत्परता।

(2) एक निश्चित कीमत : माँग का मूल्य से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। माँग सदैव एक निश्चित कीमत पर व्यक्त की जाती है। गणितीय भाषा में, D = f (P) (i.e., Demand is a function of price)। माँग और मूल्य के इस सम्बन्ध पर बल देते हुए बेनहम ने कहा है कि “माँग का अर्थ सदा एक निश्चित मूल्य पर माँग करना होता है। मूल्य को व्यक्त किये बिना मॉग का प्रायः कोई अभिप्राय नहीं होता।

(3) निश्चित समय : माँग का सम्बन्ध किसी निश्चित समय विशेष (जैसे प्रति दिन. प्रति

माँग की लोच की धारणा (The Concept of Elasticity of Demand) व्यवसाय में मूल्य निर्धारण सम्बन्धी निर्णय लेने में इस धारणा का बहुत महत्व है। इस धारणा का विकास डॉ० मार्शल ने किया है। अपने शाब्दिक अर्थ में माँग की लोच का आशय किसी माँग निर्धारक तत्व विशेष में परिवर्तन के प्रत्युत्तर में माँग में आये परिवर्तनों की मात्रा के माप से होता है किन्तु व्यवहार में इसका प्रयोग कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग की मात्रामें होने वाले परिवर्तन के माप के लिये किया जाता है क्योंकि माँग में परिवर्तन मुख्यतः कीमत के कारण ही होते हैं।

माँग की लोच के प्रकार (Kinds of Elasticity of Demand)

वस्तु की माँग पर अनेक तत्वों का प्रभाव पड़ता है। अतः प्रत्येक तत्व की अपनी माँग की लोच हो सकती है किन्तु इन तत्वों में बहुत से तत्वों का माँग पर प्रभाव बहुत ही नगण्य होता है। अतः व्यवहार में, केवल उन्हीं तत्वों की माँग की लोच का माप किया जाता है जिनका वस्तु की माँग पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। इस आधार पर माँग की लोच के मुख्य रूप से निम्न भेद किये जाते हैं :

(1) पाँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand),

(2) माँग की आय लोच (Income Elasticity of Demand),

(3) माँग की आड़ी लोच (Cross Elasticity of Demand),

(4) माँग की विज्ञापन लोच (Advertising Elasticity of Demand),

(5) स्थानापन्नता की माँग लोच (Demand Elasticity of Substitution)।

माँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand)

व्यवहार में माँग की लोच शब्द का प्रयोग ‘माँग की कीमत लोच’ के लिये ही किया जाता है। यह माँग और कीमत के पारस्परिक सम्बन्ध की मात्रा को सूचित करती है। यह कीमत में थोड़े से परिवर्तन के प्रत्युत्तर में माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन का माप प्रस्तुत करती है।

प्रो० मार्शल के शब्दों में, “एक बाजार में किसी वस्तु की माँग की लोच अधिक या कम तब कही जायेगी जब कीमत में एक निश्चित कमी होने पर उसकी माँग में अधिक या कम वृद्धि होती है तथा कीमत में एक निश्चित वृद्धि होने पर उसकी माँग में अधिक या कम कमी होती है।

प्रो० कैरनक्रास के शब्दों में, “किसी वस्तु के लिये माँग की लोच वह दर है जिस पर कीमत के बदलने के फलस्वरूप माँग की मात्रा बदलती है।

प्रो० ईस्थम के शब्दों में, “मूल्य में परिवर्तन के कारण माँग की मात्रा में होने वाले परिवर्तन का माप माँग की लोच कहलाता है।”6

प्रो० बोल्डिग के शब्दों में, “किसी वस्तु के मूल्य में एक प्रतिशत परिवर्तन होने पर इस वस्तु की माँग में जो प्रतिशत परिवर्तन होता है उसे माँग की लोच कहते हैं।7

श्रीमती जॉन रोबिन्सन के शब्दों में, “किसी कीमत या उत्पादन पर माँग की लोच कीमत में थोडे से परिवर्तन के उत्तर में क्रय की गयी मात्रा के आनुपातिक परिवर्तन को कीमत के आनुपातिक परिवर्तन से भाग देने पर प्राप्त होती है।

संक्षेप में, इसे निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है :

माँग की लोच मांग में आनुपातिक परिवर्तन

कीमत में आनुपातिक परिवर्तन माँग की लोच के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं :

(1) माँग की लोच का सम्बन्ध मूल्य तथा माँग की मात्रा के सापेक्षिक परिवर्तनों से होता है।

(2) इसके अन्तर्गत हम मॉग के उस परिवर्तन पर विचार करते हैं (अ) जो मुल्य में थोडे से परिवर्तन के फलस्वरूप होता है। मूल्य के अधिक उतार-चढ़ाव में सटे का प्रभाव अधिक होता है। (ब) जो अल्पकाल के लिये ही हो। अल्पकाल में माँग के अन्य निर्धारक तत्व अपरिवर्तित रहते हैं।

(3) माँग की लोच किसी दी हुई माँग रेखा की विशेषता है।

Business Economics Elasticity Demand
Business Economics Elasticity Demand
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Business Economics Elasticity Demand
Business Economics Elasticity Demand
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माँग की लोच का माप (Measurement of Elasticity of Demand)

इसकी निम्न पाँच रीतियाँ हैं :

(1) ढाल विधि (The Gradient Method) : इस विधि में माँग रेखा के ढाल के आधार पर लोच को मापा जाता है। इस विधि के अन्तर्गत X-अक्ष पर माँग की मात्रा और Y-अक्ष पर वस्तु का मूल्य दिखलाया जाता है। इसमें माँग रेखा के ढाल को मात्रा/मूल्य द्वारा व्यक्त किया जाता है तथा लोच को मात्रा में परिवर्तन/मूल्य में परिवर्तन से मापा जा सकता है।

इस विधि के अनुसार चपटी (flat) माँग रेखा अधिक लोचदार माँग तथा ढालू (steep) माँग रेखा कम लोचदार माँग को प्रकट करती है। माँग रेखा के लम्बरूप (Vertical) होने पर पूर्णतया बेलोचदार माँग तथा समतल (horizontal) होने पर पूर्णतया लोचदार माँग कहलायेगी। इसी तरह जब माँग रेखा की आकृति समकोणीय अधीन्द्र (Rectangular Hyperbola) हो तो उसे लोचदार माँग कहेंगे। माँग रेखा के ये सभी रूप पृष्ठ A 19 और A 20 पर चित्र 2.1 से 2.5 में दिखलाये गये हैं।

(2) कुल व्यय रीति (Total Outlay Method) : मार्शल द्वारा प्रतिपादित इस रीति में माँग की लोच के माप का आधार ‘कुल एवं कितने’ व्यय की मात्रा होती है। इसमें मूल्य परिवर्तन से पूर्व और पश्चात् वस्तु पर किये कुल व्यय की तुलना से यह ज्ञात किया जाता है कि कुल व्यय की राशि पहले से अधिक है या कम या बराबर। इसमें माँग की लोच की निम्न तीन श्रेणियाँ होती हैं :

() माँग की लोच इकाई के बराबर (e, = 1) : जब मूल्य में कमी अथवा वृद्धि पर व्यय की कुल राशि स्थिर रहती है, तब माँग की लोच इकाई के बराबर कही जाती है। इसमें जिस अनुपात में मूल्य में परिवर्तन होता है, उसी अनुपात में माँग में भी विपरीत दिशा में परिवर्तन होता है।

() माँग की लोच इकाई से अधिक (e.>1) : जब कुल व्यय तथा मूल्य में परिवर्तन विपरीत दिशा में हों अर्थात् मूल्य में कमी होने पर कुल व्यय की राशि बढ़े तथा मूल्य में वृद्धि होने पर कुल व्यय की राशि घटे, तब माँग की लोच इकाई से अधिक कहलाती है।

() माँग की लोच इकाई से कम (e. < 1) : जब कुल व्यय और मूल्य में परिवर्तन एक ही दिशा में हों अर्थात् मूल्य में कमी होने पर कुल व्यय की राशि में कमी हो तथा मूल्य में वृद्धि होने पर कुल व्यय की राशि में वृद्धि हो तब माँग की लोच इकाई से कम कहलायेगी।

Business Economics Elasticity Demand
Business Economics Elasticity Demand

(3) आनुपातिक या प्रतिशत रीति (Proportionate or Percentage Method) : मार्शल की कुल व्यय रीति का एक बहुत बड़ा दोष यह है कि इसके द्वारा माँग की लोच का संख्यात्मक रूप में माप नहीं किया जा सकता अर्थात् इस रीति से माँग की लोच का गुणांक नहीं ज्ञात किया जा सकता। यह रीति तो केवल इतना बतलाती है कि माँग की लोच इकाई से कम है या अधिक या बराबर। आनुपातिक या प्रतिशत रीति इस दोष को दूर करती है। फ्लक्स द्वारा प्रतिपादित यह रीति मार्शल की रीति से बिल्कुल भिन्न है। इस रीति के अनुसार माँग की लोच ज्ञात करने के लिये माँग में आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन को कीमत में आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन से भाग दिया जाता है। सूत्र रुप में :

Business Economics Elasticity Demand
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Business Economics Elasticity Demand
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Business Economics Elasticity Demand

Business Economics Elasticity Demand
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Business Economics Elasticity Demand

उदाहरण 10. एक विभागीय भंडार ने मानव-टाइयों के लिये माँग का अध्ययन किया। उसने पाया कि P, मूल्य के सन्दर्भ में D, औसत दैनिक माँग का समीकरण इस प्रकार है : D = 120 -5P।

(i) 20 रु० प्रति टाई के मूल्य पर भंडार प्रतिदिन कितनी टाइयों की बिक्री की आशा कर सकता है?

(ii) यदि भंडार प्रति दिन 40 टाइयाँ बेचना चाहता है तो उसे क्या मूल्य लेना चाहिये ? (iii) कोई भी व्यक्ति अधिकतम कितना मूल्य देने का इच्छुक हो सकता है ?

A departmental store conducted a study of the demand for men’s ties. It found that the average daily demand, D, in terms of price, P, is given by the equation D = 120 – 5P.

(1) How many ties per day can the store expect to sell at a price of Rs. 20 per tie.

(ii) If the store wants to sell 40 ties per day what price should it charge ?

(iii) What is the highest price anyone would be willing to pay ?

Solution :

(i) D = 120 -5P

(5) बिन्दु रीति या रेखागणितीय रीति (Point Method or Geometrical Method): इस रीति द्वारा हम एक ही माँग रेखा के किसी भी बिन्दु पर मांग की लोच ज्ञात कर सकते हैं। इसमें माँग वक्र के दो रूप हो सकते हैं :

() यदि माँग वक्र एक सरल रेखा है (जैसा कि चित्र 2.7 में BA रेखा द्वारा दिखलाया गया है) तो इस रेखा पर स्थित किसी भी बिन्दु पर माँग की लोच ज्ञात की जा सकती है। इसके माप के लिये निम्न सूत्र का प्रयोग किया जायेगा :

माँग-वक्र DD पर स्थित R बिन्दु यदि BA स्पर्श रेखा के ठीक बीच में है तो इस बिन्दु के नीचे का भाग (अर्थात् R बिन्दु से A तक की दूरी) ऊपर के भाग (अर्थात् R बिन्दु से B तक की दूरी) के बराबर होगा (चित्र में RA = RB) और माँग की लोच इकाई के बराबर (e, = 1) होगी। यदि R बिन्दु स्पर्श रेखा के मध्य बिन्दु से ऊपर है तो इस बिन्दु के नीचे का भाग ऊपर के भाग से अधिक (चित्र में RA > RB) होगा और माँग की लोच इकाई से अधिक (ep> 1) होगी। R बिन्दु मध्य बिन्दु से जितना ऊपर होता जायेगा, माँग की लोच बढ़ती जायेगी तथा जब R बिन्दु B बिन्दु पर पहुँच जायेगा (अर्थात् जब माँग वक्र पर स्थित R बिन्दु Y-अक्ष को स्पर्श करता है) तो माँग की लोच अनन्त (e, = 0) कहलायेगी क्योंकि इस बिन्दु पर नीचे का भाग BA के बराबर तथा ऊपर का भाग शून्य होगा अर्थात् en = BA = » होगा। इसी तरह यदि R बिन्दु स्पर्श रेखा के मध्य बिन्दु से नीचे है तो इस बिन्दु के नीचे का भाग ऊपर के भाग से कम (चित्र में RA < RB) होगा और माँग की लोच इकाई से कम (e, <1) होगी तथा R बिन्दु मध्य बिन्दु से जितना नीचा होता जायेगा, माँग की लोच घटती जायेगी तथा जब R बिन्दु A बिन्दु पर पहुँच जायेगा तो माँग की लोच शून्य (e, = 0) कहलायेगी क्योंकि इस बिन्दु पर नीचे का भाग शून्य और ऊपर का भाग BA के बराबर होगा अर्थात् en = 0 = 01

माँग की लोच और माँग रेखा के ढाल में सम्बन्ध

(Relationship between Elasticity of Demand and Slope of Demand Curve)

माँग की लोच और माँग-रेखा के ढाल में घनिष्ट सम्बन्ध पाया जाता है। माँग-रेखा के ढाल को देखकर ही माँग की लोच की श्रेणी का अनुमान लगाया जा सकता है। इन दोनों के बीच निम्न सम्बन्ध पाया जाता है :

(1) यदि माँगरेखा एक पूर्ण समतल YA या पड़ी रेखा है (अर्थात् यह X-अक्ष के e =0 समानान्तर है) तो माँग ‘पूर्णतया लोचदार’ (e, = ) कही जायेगी। चित्र 2.9 में ABA माँग-रेखा पूर्णतया लोचदार माँग दर्शा रही हैं।

(2) यदि माँगरेखा एक पूर्ण ढालू रेखा है (अर्थात् यह X-अक्ष पर एक खड़ी रेखा है) तो माँग ‘पूर्णतया बेलोच’ (e, = 0) कही जायेगी। चित्र 2.9 में CD माँग-रेखा पूर्णतया बेलोच माँग दर्शा रही है।

एक पूर्ण समतल रेखा और पूर्ण ढाल या खड़ी रेखा के बीच माँग-रेखा की अनेक स्थातचा हा सकती हैं जो कि पर्णतया लोचदार माँग और पूर्णतया बेलोच मॉग के बीच माग की लोच की विभिन्न श्रेणियों को प्रकट करती हैं।

(3) यदि मांगरेखा पर्णतया समतल रेखा और खडी रेखा के ठीक बीच में है (अर्थात यह X-अक्ष पर 450 का कोण बनाती है तो यह ‘लोचदार माँग’ (e, = 1) बताती है। चित्र 2.9 में PS माँग-रेखा की आकति समकोणीय अधीन्द्र (Rectangular Hyperbola) है ता। वक्र रेखा की समस्त लम्बाई पर माँग की लोच इकाई के बराबर होगा।

(4) चित्र 2.9 में PS माँग-रेखा और PB माँग-रेखा के बीच पायी जाने वाली मांग-रेखायें ‘अधिक लोचदार माँग’ बताती हैं तथा जैसे-जैसे माँग-रेखा अधिक समतल (flatter) होती जाती है, वैसे-वैसे वह अधिकाधिक माँग लोच को बताती है। चित्र 2.9 में PS, माँग-रेखा PS, माँग-रेखा से अधिक लोचदार माँग दर्शा रही है। जब माँग-रेखा पूर्णतया समतल हो जाती है तो पूर्णतया लोचदार माँग की स्थिति आ जाती है।

(5) चित्र 2.9 में PS माँग-रेखा और PD माँग-रेखा के बीच पायी जाने वाली मॉग-रेखायें कम लोचदार माँग बताती हैं तथा जैसे-जैसे माँग रेखा अधिक ढालू (steepy) होती जाती है, वैसे-वैसे वह कम लोचदार माँग को बताती है। चित्र 2.9 में PSA माग-रेखा PS, माँग-रेखा से कम लोचदार माँग दर्शा रही है। जब माँग-रेखा पूर्णतया ढालू हो जाती है तो यह पूर्णतया बेलोच माँग की स्थिति आ जाती है।

इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि माँग-रेखा का समतल होना या ढालू होना माँग की लोच की श्रेणी की पूर्ण जाँच नहीं है जैसा कि निम्न तथ्यों से स्पष्ट होता है :

(1) यदि दो माँग रेखायें भिन्न-भिन्न माप पर खींची गयी हैं तो उनका आकार अलग-अलग होगा, यद्यपि हो सकता है कि दोनों रेखायें एक ही प्रकार की माँग की दशाओं को

बतायें। चित्र 2.10 के (A) व (B) दोनों भागों में दोनों माँग रेखायें एक ही प्रकार की माँग दशाओं को बताती हैं।

किन्तु चित्र के (A) भाग में माँग-रेखा कुछ समतल है तथा (B) भाग में यह ढाल है। यह अन्तर दोनों चित्रों में X-अक्ष पर भिन्न-भिन्न माप लेने के कारण आया

माँग की लोच को निर्धारित करने वाले तत्व

(Factors Determining Elasticity of Demand)

किसी वस्तु की माँग की लोच अधिक लोचदार और किसी वस्तु की कम लोचदार होती है। प्रायः यह निम्नलिखित तत्वों से प्रभावित होती है :

1 वस्तु की प्रकृति (Nature of Product) : विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को मोटे तौर पर दो वर्गों में रखा जा सकता है : उपभोक्ता वस्तुयें तथा उत्पादक वस्तुयें। इन्हें पुनः टिकाऊ और अटिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं में विभाजित किया जा सकता है। सामान्यतया टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की माँग अटिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं से अधिक लोचदार होती है। इसी तरह स्वतन्त्र (Autonomous) तथा प्रोत्साहित (Induced) माँग वाली उत्पादक वस्तुओं की माँग की लोचों में पर्याप्त भिन्नता रहती है।

2. आवश्यकता की प्रकृति (Nature of Want) : प्रायः अनिवार्यताओं तथा रस्मी आवश्यकताओं एवं आदत की वस्तुओं की माँग बेलोचदार, आरामदायक वस्तुओं (जैसे दूध, फल आदि) की माँग साधारण लोचार तथा विलासिता की वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है।

3. स्थानापन्नों की उपलब्धता (Availability of Substitutes) : यदि वस्तु के स्थानापन्न उपलब्ध हैं तो उस वस्तु की माँग अधिक लोचदार होगी क्योंकि इस स्थिति में उपभोक्ता अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिये स्थानापन्न वस्तु की माँग कर सकता है। लेकिन यदि किसी वस्तु की कोई स्थानापन्न वस्तुयें नहीं हैं, जैसे नमक, तो उसकी माँग बेलोचदार होती है।

4. क्रेता श्रेणी (Customer Group) : केवल गरीब वर्ग द्वारा क्रय की जाने वाली वस्तुओं की माँग प्रायः अधिक लोचदार होती है क्योंकि इस वर्ग पर वस्तु के मूल्य में परिवर्तन का प्रभाव अधिक होता है। इसके विपरीत केवल धनी वर्ग द्वारा क्रय की जाने वाली वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है क्योंकि इस वर्ग के लिये वस्तु के मूल्य में वृद्धि या कमी विशेष महत्व नहीं रखती।

5. वस्तु का विभिन्न रूपों में उपयोग होना (Variety of Uses) : प्रो० मार्शल के अनसार, “जिन वस्तुओं का विभिन्न प्रकार से उपयोग हो सकता है, उन वस्तुओं की मांग। साधारणतया अधिक लोचदार होती है।” उदाहरण के लिये बिजली का प्रयोग प्रकाश करने में,

पंखा चलाने में, कमरा ठण्डा करने में, प्रेस, हीटर आदि कार्यों में हो सकता है। यदि बिजली की प्रति इकाई कीमत बढ़ जाती है तो उसका उपयोग केवल रोशनी के लिये ही होगा, लेकिन कामत के घट जाने पर उसके विभिन्न उपयोग बढ़ जाते हैं। यहाँ यह ध्यान रहे कि एक वस्तु या सेवा की माँग एक प्रयोग में बेलोचदार हो सकती है और दूसरे प्रयोग में लोचदार। मार्शल के अनुसार जिन प्रयोगों में वस्तु की सीमान्त उपयोगिता अधिक होती है, उनमें वस्तु की माँग प्रायः बेलोचदार होती है तथा जहाँ सीमान्त उपयोगिता कम होती है वहाँ वस्तु की मॉग लोचदार होती है।

6. उपभोक्ता की आय (Income of the Consumer) : यदि उपभोक्ताओं की आय कम है तो माँग अधिक लोचदार होती है तथा इसके विपरीत स्थिति में यह बेलोचदार होती है। इसका कारण यह है कि उच्च आय वाले व्यक्तियों की क्रयों पर वस्तु के मूल्य परिवर्तन का प्रायः कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आय के बढ़ने पर बढ़िया किस्म की वस्तु की माँग की लोच घटिया किस्म की वस्तु से अधिक लोचदार होती है।

7. वस्तु का मूल्य (Price of Commodity) : बहुत महँगी तथा बहुत सस्ती वस्तुओं की माँग प्रायः बेलोचदार होती है जबकि साधारण मूल्य की वस्तुओं की माँग लोचदार होती है। इसका कारण यह है कि अधिक मूल्य वाली वस्तुओं की माँग केवल धनी वर्ग के लोगों द्वारा की जाती है, अतः इनके मूल्य परिवर्तन का इस वर्ग पर प्रायः कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसी तरह बहुत कम मूल्य वाली वस्तु का उपयोग सभी व्यक्ति करते हैं। इन वस्तुओं के मूल्य परिवर्तन का इसकी कुल माँग पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके विपरीत साधारण मल्य वाली वस्तुओं के मूल्य में परिवर्तन का कम आय वाले व्यक्तियों की माँग पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

8. वस्तु पर व्यय की राशि (Amount of Expenditure on Commodity) : यदि वस्तु पर आय का बहुत थोड़ा भाग व्यय किया जाता है तो वस्तु की माँग बेलोचदार होगी, जैसे नमक, माचिस आदि। इन वस्तुओं के मूल्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन भी इनकी माँग को नहीं प्रभावित कर पाता है।

9. पूरक वस्तु की माँग (Demand of Complementary Product) : इन वस्तुओं की माँग की लोच का सीधा सम्बन्ध मुख्य वस्तु की मॉग की लोच से होता है। उदाहरण के लिये कार की माँग बढ़ने पर पैट्रोल की माँग भी बढ़ेगी। यहाँ पर पैट्रोल की माँग की लोच कार की माँग की लोच से निर्धारित होगी।

10. सरकारी नीति (Government Policy) : सरकार जनता को जिन वस्तुओं को क्रय करने की आज्ञा नहीं देती, उन वस्तुओं की माँग बेलोच रहती है।

11. समय का प्रभाव (Influence of Time) : प्रो० मार्शल के अनुसार वस्तु की माँग पर समय का भी प्रभाव पड़ता है। सामान्यतया जितना समय कम होता है, वस्त की माँग उतनी ही कम लोचदार होगी तथा जितना समय अधिक होगा, वस्तु की माँग की लोच उतनी ही अधिक लोचदार होगी क्योंकि दीर्घकाल में वस्तु के प्रतिस्थापन की सम्भावना बढ़ जाती है।

12. वस्तु के प्रयोग को स्थगित किये जाने की सम्भावना (Possibility of Postponement of Use of the Commodity) : यदि किसी वस्तु के प्रयोग को कुछ समय । के लिये टाला जा सकता है (जैसे जूता, ऊनी कोट आदि) तो उस वस्तु की माँग अधिक बार होती है। इसके विपरीत, यदि वस्तु ऐसी है जिसका उपयोग भविष्य के लिये टाला नहीं जा सकता है (जैसे रोगी की दवा, अनाज आदि) तो उसकी माँग बेलोचदार होती है।

13. वस्तु के क्रय करने की आवृत्ति (Purchase Frequency) : यदि वस्तु को बार-बार क्रय किया जाता है तो उसकी माँग अधिक लोचदार होगी तथा विपरीत स्थिति में कम रहेगी। इसीलिये टिकाऊ वस्तुओं की माँग कम लोचदार होती है।

14. समाज में धन के वितरण का प्रभाव (Effect of Distribution of Wealth) : प्रो० टॉसिग के अनुसार, “सामान्यतया समाज में धन के असमान वितरण होने पर माँग बेलोचदार होती है तथा धन के समान वितरण के साथ प्रायः सभी वस्तुओं की माँग लोचदार होती जाती है। धन के वितरण समान होने पर सभी व्यक्तियों की क्रय शक्ति समान होगी. अतः मुल्य परिवर्तन पर सभी व्यक्तियों की माँग लगभग समान रूप से प्रभावित होगी।

15. मनुष्य के स्वभाव तथा आदतों का प्रभाव (Effect of Human Nature and _Habits) : जिन वस्तुओं का प्रयोग करने की उपभोक्ता को आदत पड़ जाती है (जैसे किसी विशेष ब्राण्ड की सिगरेट या चाय पीने की आदत) उन वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है।

16. मूल्य स्तर (Price Level) : इस सम्बन्ध में मार्शल ने कहा है कि “माँग की लोच _ऊँची कीमतों के लिये अधिक होती है, मध्यम कीमत के लिये पर्याप्त होती है तथा जैसे-जैसे कीमत घटती जाती है वैसे-वैसे लोच भी घटती है और यदि कीमतें इतनी गिरें कि तृप्ति की सीमा आ जाये तो लोच धीरे-धीरे विलीन हो जाती है।” परन्तु धनी वर्ग के लिये ऊँची कीमतों की वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है। ध्यान रहे कि माँग की लोच वस्तु के वर्तमान मूल्य तथा अनुमानित भावी मूल्य दोनों से प्रभावित होती है। माँग की आड़ी लोच के लिये वस्तु की सम्बन्धित वस्तुओं के मूल्य पर ध्यान देना होगा। किसी वस्तु की स्थानापन्न वस्तु के मूल्य परिवर्तन का उस वस्तु की माँग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जबकि पूरक वस्तु के मूल्य परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ता है।

माँग की लोच का व्यावहारिक महत्व

(Practical Utility of Elasticity of Demand)

इस विचार का महत्व लार्ड कीन्स के इन शब्दों से जाना जा सकता है कि “मार्शल की सबसे बड़ी देन माँग की लोच का सिद्धान्त है जिसके बिना मूल्य तथा वितरण सिद्धान्तों का विवेचन करना कभी भी सम्भव नहीं हो पाता।” इस विचार के उपयोग के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं :

1 प्रबन्धकीय निर्णयन में उपयोगी (Useful in Managerial Decision Making) : निर्णय लेना एक प्रबन्धक का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य होता है। कार्य के निष्पादन में माँग की लोच का विचार बहुत उपयोगी है। उपयोग के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं : :

() मूल्य निर्धारण में सहायक (Helpful in Price Determination) : माँग की लोच प्रबन्धक की मूल्य नीति का आधार होती है। प्रबन्धक का मूल उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। अतः उसे मूल्य में परिवर्तनों का माँग और उनके शुद्ध लाभ पर पड़ने वाले प्रभाव को ज्ञात करना आवश्यक होता है। मूल्य में कमी करने पर वस्तु की माँग कितनी बढ़ेगी या मूल्य में वृद्धि करने पर वस्तु की माँग कितनी घटेगी, उसको ध्यान में रखते हुए ही मूल्य में परिवर्तन किया जाता है। अधिक लोचदार माँग वाली वस्तुओं का मूल्य कम रखना ही लाभदायक होता है। एसी वस्तुओं की दशा में यदि प्रबन्धक वस्त के मूल्य में थोड़ी सी कमी कर दे तो वह अधिक मात्रा में बिक्री एवं बड़े पैमाने के उत्पादन और मशीन क्षमता के अधिक प्रयोग के कारण बढ़ती हुई दर पर लाभ प्राप्त कर सकता है। किन्तु यदि वस्तु की माँग बेलोचदार है तो उस स्थिति में मूल्यों में कमी करना लाभप्रद नहीं होगा क्योंकि ऐसी वस्तु के मूल्य में कमी करने पर माँग नहीं बढ़ेगी और कुल विक्रय की राशि घट जायेगी जिसके परिणामस्वरूप व्यवसाय के लाभ भी घट जायेंगे। इसके विपरीत ऐसी वस्तु का मूल्य ऊँचा रखने पर उसकी माँग में कोई कमी नहीं आती है (अथवा मामूली सी कमी आती है, जिसके फलस्वरूप उसके विक्रय आगम बढ़ेंगे और व्यवसायी अधिकतम लाभ अर्जित करने के उद्देश्य को प्राप्त कर सकेगा। अतः उसे लोचदार माँग की दशा में मूल्य कम रखने चाहिये तथा बेलोचदार माँग की दशा में मूल्य ऊँचे रखने चाहिये।

() एकाधिकारी मूल्य निर्धारण (Monopolist Price Determination) : एक एकाधिकारी का वस्तु की पूर्ति पर पूर्ण अधिकार रहता है किन्तु माँग पर उसका अधिकार नहीं होता। अतः अपने लाभ को अधिकतम करने के लिये वह वस्तु का मूल्य उसकी माँग की लोच के अनुसार ही निर्धारित करता है। यदि उसके द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग बेलोचदार है तो वह वस्तु की कीमत ऊँची निर्धारित करेगा क्योंकि ऐसा करने से उसकी बिक्री की मात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत यदि वस्तु की माँग अधिक लोचदार है तो वह उस वस्तु का मूल्य नीचरखकर अधिक बिक्री करके अधिक लाभ कमायेगा।

() एकाधिकारी मल्यविभेदीकरण (Monopolist Price Discrimination) : मूल्य-विभेद से आशय विभिन्न ग्राहकों अथवा ग्राहकों के विभिन्न वर्गों अथवा विभिन्न बाजारों में एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न मूल्य चार्ज करना होता है। यह तब ही सम्भव होता है जबकि उनके लिये वस्तु की माँग की लोच असमान हो। एकाधिकारी उस स्थान पर वस्तु का मूल्य कम रखेगा जहाँ पर माँग लोचदार है और जहाँ माँग बेलोचदार है वहाँ वस्तु की कीमत ऊँची रखेगा।

() राशिपातन (Dumping) : राशिपातन करते समय व्यवसायी विभिन्न बाजारों में वस्तु की माँग की लोच को ध्यान में रखता है और विदेशी प्रतिस्पर्धी बाजार में माँग के लोचदार होने पर वह वस्तु की कीमत नीची कर देता है।

() संयुक्त पूर्ति में मूल्य निर्धारण (Price Determination in Joint Supply) : जब दो या दो से अधिक वस्तुओं का उत्पादन एक साथ होता है (जैसे चीनी और शीरा) तो उन वस्तुओं का मूल्य उनकी माँग की लोच के आधार पर निर्धारित होता है। जिस वस्तु की माँग लोचदार होती है उसका मूल्य कम निर्धारित किया जाता है तथा जिस वस्तु की माँग बेलोचदार होती है उसका मूल्य अधिक निर्धारित किया जाता है।

() विभिन्न उत्पत्ति के साधनों का पुरस्कार निर्धारित करना (Determining the Reward of Various Factors of Production) : प्रबन्ध को उत्पत्ति के साधनों के प्रतिफल को निर्धारित करने में भी माँग की लोच की सहायता लेनी होती है। उत्पत्ति के उन साधनों को अधिक पुरस्कार दिया जाता है जिनकी माँग बेलोचदार होती है जबकि दूसरी ओर उन साधनों को कम पुरस्कार दिया जाता है जिनकी मांग लोचदार होती है।

() प्रवर्तन सम्बन्धी लोच का आधार (Basis of Promotional Elasticity) : मांग की लोच का विचार उत्पादकों को वस्तुओं के विज्ञापन पर मुद्रा की एक बड़ी राशि व्यय करने के लिये प्रेरणा देता है क्योंकि विज्ञापन वस्तु की माँग को कम लोचदार बना देता है। अतः इससे वस्त के मल्य बढाने पर उसके विक्रय में कमी नहीं आने पाती। एक प्रबन्धक विज्ञापन और अन्य व्ययों से बिक्री की मात्रा के अनुपात को मापने के लिये निम्न सूत्र का प्रयोग करता है : प्रवर्तन लोच _ बिक्री में परिवर्तन, प्रवर्तन व्ययों का योग बिक्री का योग प्रवर्तन व्ययों में परिवर्तन

() संरक्षण के दृष्टिकोण से (From Protection Point of View) : प्रबन्धक माँग की लोच के आधार पर ही सरकार से संरक्षण की माँग करता है। यह संरक्षण उन्हीं उद्योगों को दिया जाता है जिन वस्तुओं की मांग लोचदार होती है।

2. सरकार के लिये महत्व (Importance to Government)

() करारोपण में मार्गदर्शन (Guiding in Taxation) : माँग की लोच का ध्यान

रखकर ही देश का वित्त मंत्री विभिन्न वस्तुओं पर कर लगाता है। बेलोचदार माँग वाली वस्तुओं पर कर लगाकर कर-आय बढ़ायी जा सकती है क्योंकि कर लगाने पर भी इन वस्तुओं की माँग में कोई विशेष कमी नहीं होती। दूसरीदूसरी ओर अधिक लोचदार माँग वाली वस्तुओं पर कर लगाने से सरकार की कर-आय में कमी आ सकती है क्योंकि इन वस्तुओं के मूल्य बढ़ जाने पर इनकी माँग बहुत घट जाती है।

() करभार के निर्धारण में सहायक (Helpful in Determining Tax Burden) : सरकार के लिये कर-भार की जानकारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। माँग की लोच की धारणा इसमें पर्याप्त सहायक होती है। बेलोचदार माँग वाली वस्तुओं पर कर लगाने से उत्पादक वस्तु का मूल्य बढ़ाकर कर का भार उपभोक्ताओं पर हस्तान्तरित कर देते हैं। इसके विपरीत लोचदार माँग वाली वस्तुओं पर कर-भार का अधिकांश भाग स्वयं उत्पादकों को ही वहन करना पड़ता है क्योंकि मूल्य वृद्धि करने से उन्हें वस्तु की माँग गिर जाने का भय रहेगा।

() आर्थिक नीति के निर्माण में सहायक (Helpful in Formulating Economic Policy) : व्यापार-चक्रों पर नियंत्रण करने, मुद्रा प्रसार और मुद्रा संकुचन के प्रभावों को समाप्त करने, आर्थिक नियोजन आदि में माँग की लोच का विचार सरकार के लिये पर्याप्त सहायक होता है

() सार्वजनिक सेवाओं के निश्चयन में सहायक (Helpful in Determining Public Utilities) : आजकल सरकार को यह निश्चय करना होता है कि किन उद्योगों को सार्वजनिक सेवाएँ घोषित करके उनका नियन्त्रण, प्रबन्ध एवं स्वामित्व अपने हाथ में ले। सामान्यतया बेलोचदार माँग वाली वस्तुओं को सार्वजनिक सेवाएँ माना जाता है।

(3) अन्य महत्व (Other Importance)

() विदेशी विनिमयदर के निर्धारण में सहायक (Helpful in determining Foreign Exchange Rate) : देश की मुद्रा का अवमूल्यन अथवा पुनर्मूल्यन करने से पूर्व सरकार को आयातों एवं निर्यातों की माँग की लोच का बड़ी सावधानी से अध्ययन करना होता है। आयात एवं निर्यातों की माँग बेलोचदार होने पर मुद्रा का अवमूल्यन भुगतान संतुलन में सुधार नहीं ला सकता।

() अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में महत्व (Importance in International Trade) : दो देशों के बीच व्यापार की शर्ते एक दूसरे की निर्यात वस्तुओं के लिये माँग की सापेक्षिक लोच पर निर्भर करती हैं। यदि हमारे निर्यातों की माँग बेलोचदार है तो हम ऊँची कीमत पर भी वस्तएँ बेच सकते हैं। इसी तरह यदि हमारे आयातों की माँग बेलोचदार है तो उन्हें हमें ऊँचे मल्यों पर भी खरीदना पड़ेगा।

() यातायात उद्योग में महत्व (Importance in Transport Industry) : यातायात उधोग, जसे रेलवे में भाड़े की दर निश्चित करने में माँग की लोच बहत सहायक सिद्ध होती है। यदि यातायात की माँग बेलोचदार है तो वस्तु पर भाड़े की दर ऊंची रखी जा सकती है लेकिन यदि यातायात की माँग लोचदार है तो भाड़े की दर नीची रखी जायेगी।

() उत्पादन वृद्धि नियम के समय महत्व (Importance at the time of Law of Increasing Returns) : यदि उत्पादन में वृद्धि नियम क्रियाशील हो रहा है तो वस्तु के मूल्य निर्धारण में माँग की लोच का विचार उत्पादक के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में वह वस्तु का मूल्य घटाकर उसके बाजार का विकास कर सकता है

() ‘प्रचुरता के मध्य निर्धनताके विरोधाभास की व्याख्या (Explanation of Paradox of Poverty Amids Plenty) : यह विचार हमें इस विरोधाभास को स्पष्ट करता है कि उत्पादन बढ़ने पर भी उत्पादक निर्धन क्यों रहता है। यदि किसी वस्तु की माँग बेलोचदार है तो उसके उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि मूल्यों को घटाकर अनार्थिक स्तर पर ला सकती है, विशेषतया यदि वस्तु नाशवान है। अतः ऐसी स्थिति में उत्पादन बढ़ने पर भी उत्पादक निर्धन बना रहेगा। अधिकतर कृषि उत्पादनों के सम्बन्ध में यही बात पायी जाती है।

Business Economics Elasticity Demand

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