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BCom 1st year Insolvency Accounts Study Material notes In Hindi

BCom 1st year Insolvency Accounts Study Material notes In Hindi

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BCom 1st year Insolvency Accounts Study Material notes In Hindi
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दिवालिया सम्बन्धी खाते

(Insolvency Accounts)

दिवालिये का अर्थ

(Meaning of Insolvency)

जब किसी व्यक्ति की समस्त सम्पत्तियों का मूल्य उसके दायित्वों की अपेक्षा कम रह जाता है, तो उसकी स्थिति दिवालिये जैसी हो जाती है। ऐसी स्थिति लेनदार एवं देनदार दोनों के लिये कष्टदायक होती है। लेनदारों को अपना रुपया वसूल होने की सम्भावना नहीं रहती और देनदार को अपना कारोबार चलाना कठिन हो जाता है, क्योंकि एक तो लेनदार उसे उधार देना बन्द कर देते हैं और दूसरे वे भुगतान करने के लिये उसे विवश एवं अपमानित करते रहते हैं।

दिवालिया अधिनियम (Insolvency Act) ऐसी स्थिति में उसे सहायता प्रदान करता है। जब किसी ऋणी (Debtor) को दिवालिया अधिनियम के अन्तर्गत आश्रय प्राप्त हो जाता है, तब उसे दिवालिया (Insolvent) कहा जाता है। दिवालिया घोषित हो जाने पर लेनदारों के तगादे बन्द हो जाते हैं और दिवालिये व्यक्ति को सम्पत्ति को लेनदारों में अनुपातिक रूप में वितरित करके उसे समस्त दायित्वों से मुक्त कर दिया जाता है।

भारत में Insolvent तथा Bankrupt शब्दों में कोई अन्तर नहीं किया जाता है और दोनों शब्द समान अर्थ में ही प्रयोग होते हैं। परन्तु इंग्लैंड में Insolvent उस व्यक्ति को कहते हैं जिसकी स्थिति दिवालिये जैसी हो जाती है और जब उसे न्यायालय द्वारा संरक्षण प्राप्त हो जाता है तब उसे Bankrupt कहा जाता है, अतः Bankrupt उस व्यक्ति को कहते हैं जिसे दायित्वों के विषय में न्यायालय का संरक्षण प्राप्त हो जाता है।

दिवालिये के अधिनियम

(Acts of Insolvency)

भारतवर्ष में दिवालिये से सम्बन्धित दो अधिनियम लागू हैं :

1. प्रेसीडेन्सी टाउन्स दिवालिया अधिनियम, 1909 (Presidency Towns Insolvency Act, 1909),

2. प्रान्तीय दिवालिया अधिनियम, 1920 (Provincial Insolvency Act, 1920)

प्रथम अधिनियम केवल बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) एवं मद्रास (चेन्नई) शहरों में ही लागू होता है तथा दूसरा अधिनियम शेष भारत वर्ष में लागू होता है। यदि प्रश्न में यह नहीं दिया है कि दिवालिया कहाँ रहता है, तो प्रान्तीय दिवालिया अधिनियम लागू माना जाता है।

दिवालिया घोषित होने की विधि

(Procedure for Declaration of Insolvent)

दिवालिया अधिनियम के अन्तर्गत आश्रय केवल व्यक्ति अथवा साझेदारी फर्म को ही प्राप्त होता है, कम्पनी को नहीं। दिवालिया। घोषित होने की विधि निम्न प्रकार है :

[I] न्यायालय में प्रार्थना-पत्र (Petitioin in Court): यह प्रार्थना पत्र ऋणी अथवा ऋणदाता कोई भी दे सकता है। ऋणी द्वारा प्रार्थना-पत्र निम्न स्थिति में ही दिया जा सकता है :

  1. जब वह 500 रु० या अधिक धनराशि के लिये ऋणी है।
  2. वह ऋण का भुगतान करने में असमर्थ है।
  3. उसकी सम्पत्ति के सम्बन्ध में कुर्की का आदेश (Attachment Order) पारित हो गया है अथवा वह हिरासत में है।

ऋणदाता निम्न दशाओं में ऐसा प्रार्थना-पत्र दे सकता है :

1. जब उसे ऋणी से 500 रु0 या अधिक धनराशि लेनी है।

2. जब प्रार्थना-पत्र देने से पूर्व तीन माह के अन्तर्गत ऋणी ने दिवालिये का आचरण किया है। ऐसा आचरण निम्न परिस्थितियों में माना जायेगा :

(अ) यदि ऋणी ने 500 रु0 या इससे अधिक धनराशि का भुगतान करने से मना कर दिया है।

(ब) यदि लेनदारों को धोखा देने अथवा भुगतान में देर करने के इरादे से अपनी सम्पत्ति किसी तृतीय पक्ष को हस्तान्तरित करता है।

(स) यदि ऋणी अपनी सम्पत्ति का कपटपूर्ण हस्तान्तरण करता है।

(द) यदि ऋणी ने अपने लेनदारों का भुगतान के लिये मना कर दिया है।

(य) यदि ऋणी लेनदारों से बचने के लिये अपने निवास पर नहीं रहता है अथवा बाहर चला गया है।

(र) यदि ऋणी न्यायालय में दिवालिया घोषित होने के लिये प्रार्थना-पत्र देता है।

(ल) यदि ऋणी लेनदार द्वारा दिये गये नोटिस का पालन नहीं करता है।

(ब) यदि ऋणी के विपरीत न्यायालय का डिक्री आदेश निष्फल रहता है जिसके कारण वह जेल जाता है।

[I] सुनवाई (Hearing): आवेदन-प्राप्त होने के उपरान्त उस पर विचार करने के लिये न्यायालय एक तिथि तय करता है जिसकी सूचना ऋणी और लेनदारों को दी जाती है। इस तिथि को सुनवाई की तिथि (Date of Hearing) कहते हैं।

[III] दिवाला आदेश (Adjudication Order): सभी सम्बन्धित पक्षों को सुनकर यदि न्यायालय यह निर्णय करता है कि ऋणी को दिवालिया घोषित कर देना उचित है, तो दिवाला आदेश (Adjudication Order) पारित कर दिया जाता है जिसका परिणाम यह होगा कि ऋणी में अनुबन्ध करने की क्षमता नहीं रहेगी और वह अब कोई वैद्य लेन-देन नहीं कर सकता और न ही अब उसके लेनदार उस पर अपने धन के लिये तकाजा करेंगे।

[IV] निपटारा अधिकारी की नियुक्ति (Appointment of Settlement Officer): दिवाला आदेश के उपरान्त न्यायालय एक अधिकारी की नियुक्ति कर देता है जो ऋणी की समस्त सम्पत्तियों पर अपना कब्ज़ा कर लेता है। यह अधिकारी प्रान्तीय दिवालिया अधिनियम में आफिशिअल रिसीवर (Official Receiver) और प्रेसीडेन्सी टाऊन्स दिवालिया अधिनियम में आफिशिअल एसाइनी (Official Assignee) कहलाता है।

[V] सम्पत्तियों की वसूली तथा लेनदारों का भुगतान (Realisation of Assets and Payment to Creditors) : इस अधिकारी को वे सब अधिकार मिल जाते हैं जो ऋणी के होते हैं। यह दिवालिये व्यक्ति के व्यापार को कुछ समय, यदि लेनदारों के हित में समझता है, चला सकता है। ऋणी की सम्पत्तियों को विक्रय करके लेनदारों का क्रम से भुगतान कर सकता है। सुरक्षित लेनदारों का भुगतान करने के उपरान्त पूर्वाधिकारी लेनदारों का भुगतान किया जाता है और शेष धनराशि अरक्षित लेनदारों में उनके अनुपात में वितरित कर दी जाती है।

[VI] न्यायालय को रिपोर्ट (Report to Court) : अधिकारी अपना कार्य पूर्ण करने के उपरान्त अपनी रिपोर्ट न्यायालय को भेज देता है।

[VII] मुक्ति प्रमाण-पत्र (Discharge Certificate) : अधिकारी की रिपोर्ट आ जाने पर न्यायालय ऋणी को एक प्रमाण-पत्र, जिसे मुक्ती प्रमाण-पत्र (Discharge Certificate) कहते है, देता है। अब ऋणी समस्त ऋणों से मुक्त हो जाता है और उसमें अनुबन्ध करने क्षमता भी आ जाती है। वह अपना व्यापार फिर से आरम्भ कर सकता है।

ब्याज (Interest) : दिवाला आदेश हो जाने के बाद दिवालिये के लेनदार ब्याज की माँग नहीं कर सकते। परन्तु यदि सभी लेनदारों का पूर्ण भुगतान हो जाता है, तो उन्हें 6% ब्याज दिया जा सकता है।

आदाता (Receiver) द्वारा दिवालिये की सम्पत्ति को निम्न प्रकार से प्रयुक्त किया जाता है : ।

(1) जो सम्पत्ति पूर्ण रक्षित ऋणदाताओं (Fully Secured Creditors) के पास रहन होती है अथवा जिस सम्पत्ति पर अणटाताओं का ग्रहणाधिकार (Right of Lien) अथवा प्रभार (Charge) होता है, उसका इन देनदारियों का भुगतान करने के लिये।

योग किया जाता है। यदि इनकी सन्तुष्टि के उपरान्त कोई धनराशि शेष बचती है तो वह अन्य लेनदारों के भगतान के लिए प्रयक्त। की जाती है।

(2) जो सम्पत्ति आंशिक रक्षित ऋणदाताओं (Partly Secured Creditors) के पास रहन होती है अथवा उनके ग्रहणाधिकार में होती है या उस सम्पत्ति पर उनका प्रभार होती है तो उससे उनके ऋणों का भुगतान किया जाता है तथा शेष ऋण के लिये वह अरक्षित ऋणदाताओं के समान माने जाते हैं।

इसके उपरान्त सम्पत्ति के विक्रय से प्राप्त धनराशि तथा दिवालिये के देनदारों से प्राप्त धनराशि में से सर्वप्रथम पूर्वाधिकारी ऋणदाताओं (Preferential Creditors) का भुगतान किया जाता है।

शेष धनराशि को अन्य ऋणदाताओं (जो अरक्षित है) के ऋणों की सन्तुष्टि के लिये प्रयोग में लाया जाता है। सभी ऋणदाताओं . को भुगतान करने के पश्चात् (चाहे आंशिक भुगतान ही हो) ऋणी को ऋणों के सम्बन्ध में मुक्त कर दिया जाता है और वह फिर से | अपना कारोबार चलाने की स्थिति में हो जाता है, उसे मुक्त दिवालिया (Discharged Insolvent) कहते हैं। उसे इस आशय का । न्यायालय से एक प्रमाण पत्र भी मिलता है जिसे मुक्ति पत्र (Discharge Certificate) कहते हैं।

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