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BCom 1st Year Business Economics Isoquants ISO Product Curve Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Isoquants ISO Product Curve Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Isoquants ISO Product Curve Study Material Notes in Hindi : Meaning and Definition of iso Product or isoquant curve Assumptions of Isoquant Curve Difference Between Indifference Curves and Isoquants Map Marginal Rate of Technical Substitution Characteristics or Properties of Isoquant Curves Economic Region of Production Optimum Factor Combinations Factor Price Effect Expansion Path Theoretic Questions Long Answer Questions Short Answer Questions :

BCom 1st Year Business Economics Isoquants ISO Product Curve Study Material Notes in Hindi
BCom 1st Year Business Economics Isoquants ISO Product Curve Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Business Economics Production Function Study Material Notes in Hindi

समोत्पाद वक्र

(Isoquants or iso-Product Curve)

Isoquant शब्द ग्रीक भाषा के ‘iso’ और ‘quantus’ से व्युत्पादित है। Iso का आशय equal (सम) तथा quantus का आशय quantity (मात्रा) होता है। इसीलिये Isoquant curve को Equal Product Curve (समोत्पाद वक्र) भी कहते हैं।

समोत्पाद वक्र विश्लेषण एक उत्पादक को दो साधनों (श्रम और पूँजी) के एक ऐसे संयोग को प्राप्त करने में सहायक होता है जो उसे न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन देता है। दूसरे शब्दों में, यह विश्लेषण साधनों के अनुकूलतम संयोग की समस्या का हल निकालता है।।

समोत्पाद वक्र का आशय और परिभाषा

(Meaning and Definition of Iso-Product or Isoquant Curve)

एक समोत्पाद वक्र दो साधनों (श्रम और पूँजी) के उन विभिन्न संयोगों का बिन्दु पथ है जिनसे समान मात्रा में उत्पादन होता है। चूंकि ये सभी संयोग समान उत्पादन देते हैं, अतः एक उत्पादक इन संयोगों के प्रति तटस्थ हो जाता है, इसीलिये इस वक्र को उत्पादन तटस्थता वक्र (Production Indifference Curve) भी कहते हैं।

कीरस्टीड के शब्दों में, “समोत्पाद वक्र दो साधनों के उन सभी सम्भावित संयोगों को बताता है जो समान कुल उत्पादन प्रदान करते हैं।

कोहन के शब्दों में, “एक समोत्पाद वक्र वह वक्र होता है जिस पर उत्पादन की अधिकतम प्राप्ति दर स्थिर होती है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समोत्पाद वक्र उत्पादन के दो साधनों के समान उत्पादन देने वाले अनेक संयोग बिन्दुओं को मिलाकर बनता है किन्तु ध्यान रहे कि एक समोत्पाद वक्र एक उत्पादन स्तर को ही प्रकट करता है।

उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण : समोत्पाद वक्र के विचार को स्पष्ट करने के लिये समान उत्पादन मात्रा (माना कि 100 कुन्तल अनाज का उत्पादन) देने वाले अ, ब, स, द और इ पाँच संयोगों को निम्न तालिका में दर्शाया गया है –

Isoquants ISO Product Curve
Isoquants ISO Product Curve

उपर्युक्त तालिका में श्रम और पूँजी साधनों के उन सभी संयोगों को दिखलाया गया है जिनसे 100 कुन्तल अनाज का उत्पादन प्राप्त होता है। इस तालिका में श्रम की लगातार एक इकाई बढ़ाने पर पूँजी की उत्तरोत्तर मात्रा को घटाकर दिखाया गया है ताकि कुल उत्पादन पूर्ववत् रहे। तालिका के अन्तिम खाने में श्रम की पूँजी से तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर दिखलायी गयी है जो कि घटते हुए क्रम में है। दूसरे शब्दों में, श्रम की एक अतिरिक्त 12 इकाई बढ़ाने पर पूँजी की इकाइयों में कमी 10 क्रमशः घटती दर से होती है।

Isoquants ISO Product Curve
Isoquants ISO Product Curve

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण : उपर्युक्त तालिका के आधार पर श्रम और पूँजी के अ, ब, स, द और इ संयोगों से एक समोत्पाद वक्र IQ की रचना की गई है। चित्र 2.1 में X-अक्ष पर श्रम और Y-अक्ष पर पूँजी की इकाइयाँ दर्शायी गयी हैं। चित्र में वक्र पर सभी संयोग समान उत्पादन श्रम (100 कुन्तल) प्रदान करते हैं।

समोत्पाद वक्र की मान्यताएँ (Assumptions of Isoquant Curve)

समोत्पाद वक्रों की रचना निम्नलिखित मान्यताओं पर की जाती है –

1 यह व्याख्या उत्पत्ति के केवल दो ही साधनों (श्रम और पूँजी) के संदर्भ में की जाती है। तीन साधनों की स्थिति में यह विश्लेषण अत्यन्त जटिल हो जाता है।

2. उत्पादन की तकनीक में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

3. उत्पादन के साधनों की मात्राओं को छोटी-छोटी मात्रा में बाँटा जा सकता है। इस मान्यता के कारण ही हम समतल सम-उत्पाद रेखाएँ खींच पाते हैं।

4. उत्पादन के साधनों का एक दूसरे से प्रतिस्थापन किया जा सकता है तथा दी हुई ‘उत्पादन की तकनीकी दशाओं के अन्तर्गत इन्हें अधिकतम सम्भव कुशलता के साथ मिलाया जा सकता है।

Isoquants ISO Product Curve

तटस्थता वक्र रेखाओं और समोत्पाद वक्र रेखाओं में अन्तर

(Difference between Indifference Curves and Isoquants)

समोत्पाद वक्र तटस्थता वक्र के ही समान होता है क्योंकि दोनों में ही दो वस्तुओं/साधनों के समान सन्तुष्टि/उत्पादन देने वाले संयोगों को दर्शाया जाता है। दोनों ही वक्रों का स्वरूप। काफी मिलता जुलता है। फिर भी दोनों में निम्नलिखित दो प्रमुख अन्तर हैं –

1 तटस्थता वक्र दो उपभोक्ता वस्तुओं का बनाया जाता है, जबकि समोत्पाद वक्र दो उत्पादन के साधनों (श्रम और पूँजी) का बनाया जाता है।

2. तटस्थता वक्र सन्तुष्टि का माप करता है जबकि समोत्पाद वक्र ‘उत्पादन’ का माप करता है। इसीलिये एक तटस्थता वक्र को परिमाणात्मक मूल्य (numerical value) नहीं प्रदान किया जा सकता है क्योंकि सन्तुष्टि का कोई भौतिक माप सम्भव नहीं; किन्तु समोत्पाद वक्र को परिमाणात्मक मूल्य प्रदान किया जाता है क्योंकि उत्पादन का भौतिक माप सम्भव है।

समोत्पाद मानचित्र (Isoquant Map)

एक समोत्पाद वक्र पर स्थित सभी संयोगों के बिन्दु एक समान उत्पादन-मात्रा दर्शाते हैं। एक उत्पादक के अनेक समोत्पाद वक्र हो सकते हैं जो उत्पादन-मात्रा के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं। उत्पादन के विभिन्न स्तरों को व्यक्त करने वाले वक्रों को समोत्पाद मानचित्र (Isoquant Map) कहते हैं। यह मानचित्र एक उत्पाद के उत्पादन की तकनीकी दशाओं को बतलाता है। इसे चित्र 2.2 में दिखलाया गया है। चित्र में IQ, उत्पादन के न्यूनतम स्तर 100

Isoquants ISO Product Curve
Isoquants ISO Product Curve

इकाइयों को दर्शाता है जबकि IQ, , IQ, तथा IQ, उत्पादन के क्रमशः उच्चतर स्तरों 200, 300 व 400 इकाइयों को व्यक्त करता है। अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक अगला समोत्पाद वक्र अपने से पहले वाले समोत्पाद वक्र से ऊँचे उत्पादन के स्तर को व्यक्त करता है। एक ऊँचा समोत्याद वक्र नीचे वाले समोत्याद वक्र से अधिक श्रम या पूँजी या दोनों की अधिक मात्राओं के प्रयोग वाले संयोगों से बनता है।

तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर

(Marginal Rate of Technical Substitution)

उत्पादन सिद्धान्त के अन्तर्गत तकनीका प्रतिस्थापन की सीमान्त दर की धारणा एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। यह विचार उसे उत्पादन साधनों के सर्वाधिक मितव्ययितापर्ण पाप्त करने में सहायक सिद्ध होता है। यह विचार उपभोग सिद्धान्त के तटस्थता वक्र विश्लेषण में प्रतिस्थापन की सीमान्त दर की धारणा के समान है। जैसा कि हम जानते हैं कि एक उत्पादक उत्पादन-कार्य में कार्यकुशलता बढ़ाने और उत्पादन लागत में बचत करने हेतु एक उत्पादन साधन का दूसरे उत्पादन साधन से (जैसे श्रम के स्थान पर पूँजी अथवा पूँजी के स्थान पर श्रम का प्रयोग) प्रतिस्थापन करता है। दो साधनों (X और Y) के बीच तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमांत दर वह दर है जिसके अनुसार उत्पत्ति मात्रा को स्थिर रखते हुए एक साधन को दूसरे साधन से सीमान्त पर प्रतिस्थापित किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, x साधन की Y साधन के लिये तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमांत दर का आशय है X साधन की एक इकाई Y साधन की कितनी इकाइयों के स्थान पर प्रयोग की जा सकती है बशर्ते कि उत्पादन की मात्रा पूर्ववत् रहे। तकनीकी भाषा में साधन X की साधन Y के लिये तकनीकी सीमान्त प्रतिस्थापन दर साधन X तथा साधन Y की सीमान्त उत्पादकताओं के अनुपात को बताती है।

Isoquants ISO Product Curve
Isoquants ISO Product Curve

A, B,C, D और E पाँचों संयोगों का उत्पादन स्तर समान है। जैसा कि तालिका से स्पष्ट है कि तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर गिरती हुई होती है। दूसरे शब्दों में सभोत्पाद वक्र पर बायें से दायें जाने पर वक्र का ढाल घटता जाता है। चित्र 2.1 में देखिये। IQ वक्र से स्पष्ट है कि श्रम की प्रत्येक एक इकाई बढ़ाने पर पूँजी की इकाइयों में कभी क्रमशः घटती दर से की जा रही है। इसे तकनीकी प्रतिस्थापन की हासमान सीमान्त दर का सिद्धान्त कहते हैं। समोत्पाद वक्र का मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर होना तकनीकी प्रतिस्थापन की हासमान सीमान्त दर को ही व्यक्त करता है।

तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर समोत्पाद वक्र के ढाल को मापती है।.

एक समोत्पाद वक़ के किसी बिन्दु पर तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर को मापा जा सकता है। इसके लिये पूँजी की परिवर्तित मात्रा में श्रम की परिवर्तित मात्रा का भाग दिया जाता है। चित्र 2.3 में IQ समोत्पाद वक्र है जिस पर MRTS ज्ञात करने के लिये E व E दो बिन्द लिये गये हैं। E बिन्दु को स्पर्श करती हुई AB रेखा तथा E बिन्दु को स्पर्श करती हुई CD रेखा खींची गई है। समोत्पाद वक्र के E बिन्दु पर तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर (MRTS) = 40 तथा वक्र के E, बिन्दु पर MRTS — OC ОВ

सामान्यतया समोत्पाद वक्र में तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर घटती हुई होती है।। इसके दो कारण हैं – (i) एक साधन दूसरे साधन का पूर्ण स्थानापन्न नहीं होता और (i) सभी साधनों का सीमान्त प्रतिफल घटता हुआ होता है। अतः जब हम श्रम की इकाइयाँ बढाते हैं तो श्रम की सीमान्त भौतिक उत्पादकता (अर्थात् श्रम की एक अतिरिक्त इकाई का अंशदान) गिरती है क्योंकि तुलनात्मक रूप से अकुशल श्रमिकों की भर्ती की जायेगी। दूसरी ओर पूँजी की पूँजी की अकुशल इकाइयाँ प्रयोग से बाहर हो जाती हैं। अतः उत्पादन के स्तर को पूर्ववत बनाये रखने के लिये श्रम की प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के प्रतिस्थापन के लिये पूँजी की उत्तरोत्तर कम इकाइयों की कमी की आवश्यकता होती है। इसे तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर का सिद्धान्त कहते हैं।

Isoquants ISO Product Curve

अपवाद (Exceptions) – तकनीकी प्रतिस्थापन की हासमान सीमान्त दर के निम्नलिखित दो प्रमुख अपवाद हैं :Perfect Substitutes of each other)-

इस स्थिति में तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर घटती हुई न होकर स्थिर (Constant) रहती है। इस अवस्था में उत्पादन का कोई भी साधन एक दूसरे AA के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। इस अवस्था में समोत्पाद वक्र एक ऋणात्मक ढाल वाली सीधी रेखा के होगा। दूसरे शब्दों में, यह रेखा बायें से दायें नीचे गिरती हुई चली जाती है। चित्र 2.4 में इसे प्रदर्शित किया गया है। चित्र में AB समोत्पाद वक्र से स्पष्ट है कि फर्म को श्रम की प्रत्येक एक इकाई के बढ़ाने पर पूँजी की भी एक ही इकाई की कमी करनी पड़ती है। इस अवस्था में तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त होगी तथा समोत्पाद वक्र X-अक्ष पर 45° का कोण बनाने वाली सीधी रेखा होगा। इस प्रकार के वक्र को रेखीय समोत्पाद वक्र (Linear Isoquant) कहते हैं। चित्र के A व B बिन्दुओं से यह भी स्पष्ट है कि एक निश्चित मात्रा में उत्पादन की प्राप्ति केवल पूँजी या केवल श्रम या दोनों से की जा सकती है। लेकिन वास्तविक व्यवहार में साधनों की पूर्ण स्थानापन्नता की स्थिति देखने को नहीं मिलती।

(2) जब दो साधन एक दूसरे के पूर्ण पूरक हैं (When the two Factors are Perfect Complements)-ब उत्पत्ति के साधन एक स्थिर अनुपात में प्रयोग किये जाते हैं तो उन्हें एक दूसरे का पूर्ण पूरक कहेंगे। साधनों की पूर्ण पूरकता (Perfect Complementarity) का आशय यह है कि वस्तु की एक निश्चित मात्रा के उत्पादन के लिये दोनों साधन एक निश्चित अनपात में ही प्रयोग किये जाते हैं। यदि एक साधन की मात्रा को स्थिर रखकर दूसरे साधन की मात्रा में वृद्धि की जाती है तो उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं होगी क्योंकि बढाये गये साधन की इकाइयाँ दूसरे साधन की इकाइयों के अभाव में खाली या व्यर्थ ही पडी रहेंगी। इस अवस्था में समोत्पाद वक्र L-आकृति वाला होता है। (चित्र सं 2.5 को देखिये) इसीलिये इस प्रकार के Proportion or L-Shaped Isoquant) कहते हैं।

चित्र में IQ, वक्र श्रम की 2 इकाइयाँ और पूँजी की 4 इकाइयों के संयोग को व्यक्त । करता है तथा इस संयोग पर 50 इकाइयों का उत्पादन होता है। इस वक्र का प्रासंगिक भाग A द्वारा प्रकट किया गया है। इसी प्रकार IQ2y वक्र 100 इकाइयों के उत्पादन को व्यक्त करता है और इसका प्रासंगिक भाग B द्वारा प्रकट ” किया गया है। दोनों वक्रों में उन्नतोदरता (Convexity) का अभाव है अर्थात इन वक्रों 5.8की तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर घटती हुई नहीं है।

वास्तविक व्यवहार में स्थिर अनुपात उत्पादन फलन के अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिये एक टैक्सी को चलाने के लिये केवल एक ड्राइवर की आवश्यकता होगी। अतः

चित्र 2.5 इस व्यापार को बढ़ाने के लिये मोटर गाड़ी और ड्राइवरों की संख्या 1 : 1 के अनुपात में ही रखनी होंगी।

समोत्पाद वक्रों की विशेषताएँ या गुण

(Characteristics or Properties of Isoquant Curves)

(1) समोत्पाद वक्र बायें से दायें नीचे की ओर झुकता है (An isoquant curve slopes downward from left to right): समोत्पाद वक्र का ढाल ऋणात्मक होता है तथा यह एक साधन का दूसरे साधन के लिये तकनीकी स्थानापन्नता (Technical Substitutability) पर निर्भर करता है। इसका कारण यह है कि जब हम उत्पादन के एक साधन की इकाइयाँ बढ़ाते हैं तो समान उत्पादन बनाये रखने के लिये दूसरे साधन की इकाइयाँ घटानी पड़ती हैं।

(2) समोत्पाद वक्र अनेक हो सकते हैं तथा ऊँचा समोत्पाद वक्र ऊँचा उत्पादन स्तर बतलाता है। (There can be many isoquants and upper isoquant represents higher level of output): दो  आदान साधनों के अनेक समोत्पाद वक्र हो सकते हैं तथा प्रत्येक वक्र एक पृथक उत्पादन स्तर के संयोगों को दर्शाता है। प्रत्येक बायें से दायें वाला वक्र उत्पादन के उच्च स्तर को दर्शाता है। चित्र 2.6 में IQ1, IQ, तथा IQ. तीन समोत्पाद वक्र दर्शाये गये हैं। IQ. वक्र का उत्पादन स्तर IQ, वक्र से ऊँचा है तथा IQ, वक्र का उत्पादन स्तर IQ, वक्र से भी श्रम अधिक ऊँचा है।

(3) समोत्पाद वक्र मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर होते हैं  (Isoquants are convex to the origin) : समोत्पाद वक्र के मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर का आशय यह है कि जब उत्पादक एक समोत्पाद वक्र रेखा पर बायें से दायें नीचे की ओर चलता है तो वह श्रम साधन (X) का। प्रत्येक इकाई को पूँजी साधन (Y) की घटती हुई मात्रा से प्रतिस्थापित करता है। वस्तुतः इस। रेखा का उन्नतोदर स्वरूप ‘घटती हुई सीमान्त तकनीकी प्रतिस्थापन दर’ को व्यक्त करता है।।

समोत्पाद वक्र की उन्नतोदरता (Convexity) की मात्रा तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर में परिवर्तन की दर पर निर्भर करती है; जितनी तेजी से इस दर में गिरावट आती. है समोत्पाद वक्र की उन्नतोदरता उतनी ही अधिक होगी।

(4) समोत्पाद वक्र एक दूसरे को स्पर्श या काटते नहीं (Isoquants never touch or intersect each other) : दो साधनों के अनेक समोत्पाद वक्र हो सकते हैं। प्रत्येक वक्र उत्पादन मात्रा के एक निश्चित स्तर को बतलाता है। अतः । विभिन्न समोत्पाद वक्रों पर उत्पादन के स्तर भी विभिन्न होंगे और वे एक दूसरे को स्पर्श या काट नहीं सकते। यदि एक वक्र किसी दूसरे वक्र को काटता है (जैसा कि चित्र 2.7 में दिखलाया गया है) या स्पर्श करता है, तो इसका आशय यह हुआ कि उत्पादक को दोनों वक्रों के K बिन्दु पर समान उत्पादन प्राप्त होता है किन्तु यह सम्भव नहीं क्योंकि श्रम दो समोत्पाद वक्र उत्पादन के दो विभिन्न स्तरों को बतलाते हैं।

Isoquants ISO Product Curve

(5) एक समोत्पाद वक्र क्षैतिजीय नहीं हो सकता (An isoquant curve can not be horizontal) : समोत्पाद वक्र क्षैतिजीय तभी हो सकता है जबकि पूँजी साधन (y) की मात्रा को स्थिर रखते हुए श्रम साधन (x) की मात्रा बढ़ाने पर भी उत्पादन की मात्रा पूर्ववत् ही रहे। चित्र 2.8 में A और B दो संयोग दर्शाये गये हैं। A संयोग पर पूँजी की OK मात्रा तथा श्रम की OL मात्रा के लगाने पर एक निश्चित मात्रा में उत्पादन प्राप्त हो रहा है जबकि B संयोग पर पूँजी की मात्रा वही OK है किन्तु श्रम की मात्रा OL से बढ़ाकर OL कर दी गई है। इस संयोग पर भी उत्पादन की वही मात्रा प्राप्त होने का आशय यह हुआ कि श्रम साधन की मात्रा के बढ़ाने का उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं। किन्तु यह सम्भव नहीं। यदि ऐसा होता है तो कोई भी विवेकशील उत्पादक श्रम की मात्रा नहीं बढ़ायेगा। अतः स्पष्ट है कि समोत्पाद वक्र क्षैतिजीय नहीं हो सकता।

(6) समोत्पाद वक्र लम्बवत् नहीं हो सकता (An isoquant can not be vertical) : एक समोत्पाद वक्र x-अक्ष पर लम्बवत् भी नहीं हो सकता, जैसा कि चित्र 2.9 में दिखाया गया है। समोत्णद वक्र के लम्बवत होने का अभिप्राय यह होगा कि श्रम की मात्रा को स्थिर रखते हुए पूँजी की मात्रा बढ़ाते जाने पर भी उत्पादन मात्रा पूर्ववत् ही रहे, किन्तु ऐसा सम्भव नहीं। वस्तुतः जब उत्पादक श्रम की मात्रा को स्थिर रखते हुए पूँजी की मात्रा OK से बढ़ाकर OK, करता है तो पहले से अधिक उत्पादन प्राप्त होगा जोकि एक भिन्न समोत्पाद वक्र को जन्म देगा। अतः B संयोग IQ वक्र पर नहीं हो सकता।

(7) समोत्पाद वक्र की आकृति धनात्मक नहीं हो सकती (An isoquant can not have an upward slope) : चित्र 2.10 में IQ वक्र को धनात्मक दर्शाया गया है किन्तु ऐसा सम्भव नहीं पूँजी की मात्रा तथा OL श्रम की मात्रा लगाकर A संयोग प्राप्त किया गया है। इसी वक्र पर B संयोग दर्शाया गया है जो कि श्रम और पूँजी की बढ़ी हुई मात्रायें क्रमशः OL, तथा OK, के लगाने पर प्राप्त हुआ है। वास्तव में श्रम और पूँजी की अधिक मात्रायें लगाने पर पहले से अधिक उत्पादन प्राप्त होगा और वह एक पृथक समोत्पाद वक पर दर्शाया जायेगा। अतः स्पष्ट है कि समोत्पाद वक्र की आकृति चित्र 2.10 की तरह नहीं हो सकती। किन्तु यदि एक साधन की सीमान्त उत्पादकता ऋणात्मक हो जाती है तो समोत्पाद वक्र पीछे की ओर झुक सकता है और इसका ढाल धनात्मक हो सकता है। चित्र 2.11 में IQ वक्र के AD और BC भागों को देखिये।

(8) समोत्पाद वक्र रिज रेखाओं को अंकित करने में सहायक होते हैं (Isoquants are helpful in delineating ridge lines) : समोत्पाद वक्र की एक विशेषता यह भी है कि ये वक्र व्यावसायिक फर्म के लिये उपयुक्त उत्पादन क्षेत्र का सीमांकन करते हैं अर्थात् ये वक्र एक फर्म को बताते हैं कि उसे किन सीमाओं के बीच उत्पादन करना लाभदायक होगा। समोत्पाद वक्रों के वे भाग जो रिज रेखाओं के अन्तर्गत आते हैं, लाभदायक उत्पादन के लिये उपयुक्त होते हैं।

उत्पादन का आर्थिक क्षेत्र (Economic Region of Production)

समोत्पाद वक्र विश्लेषण एक उत्पादक को उसके उत्पादन का आर्थिक क्षेत्र ज्ञात करने में सहायक है। समोत्पाद वक्र सामान्यतया ऋणात्मक ढाल वाले तथा मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर होते हैं- किन्तु यदि उत्पादक आवश्यकता से अधिक श्रम अथवा पूँजी अथवा दोनों साधनों का प्रयोग करता है तो ये वक्र अण्डाकार (पीछे की ओर मोड़ लेते हए) अर्थात धनात्मक ढाल वाले। भाग सहित हो जाते हैं, जैसा कि चित्र 2.12 में दर्शाया गया है। अण्डाकार आकृति वाले या। पीछे की ओर झुके हुए समोत्पाद वक्र का आशय यह है कि एक निश्चित बिन्दु (साधन का। शून्य सीमान्त उत्पादकता वाला बिन्दु) के बाद किसी एक साधन की अतिरिक्त इकाइया लगाये जाने पर पूर्व स्तर का उत्पादन प्राप्त करने के लिये दूसरे साधन की भी अतिरिक्त इकाइयों के लगाने की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति में एक विवेकशील उत्पादक समोत्पाद वक्रों के उन्हीं क्षेत्रों में उत्पादन निश्चित करेगा जो कि मूल बिन्दु की और उन्नतोदर या रिज रेखाओं के बीच स्थित हों। इस कथन को नीचे चित्र सं02.12 की सहायता से स्पष्ट किया गया है।

चित्र में धनात्मक ढाल वाले भाग सहित IQ. yA IO, तथा IQ तीन समोत्पाद वक्र प्रदर्शित किये गये हैं। चित्र में IQवक्र का A B भाग ऋणात्मक ढाल वाला है तथा A और B. बिन्दुओं के बाद वाले भाग धनात्मक ढाल वाले (या तो पीछे की ओर मुड़ा हुआ या ऊपर की ओर चढ़ा हुआ) हैं।

A, बिन्दु पर पूँजी की सीमान्त उत्पादकता शून्य हो जाती है। वस्तुतः यह श्रम के पूँजी से श्रम प्रतिस्थापन की अधिकतम सीमा है। इस बिन्द्र के बाद समोत्पाद वक्र लम्बवत् (Vertical) हो जाता है। अतः यदि श्रम की मात्रा को स्थिर रखकर केवल पूँजी की मात्रा बढ़ायी जाती है तो उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं होती है अर्थात् यहाँ पर पूँजी की ये अतिरिक्त इकाइयाँ फालतू या व्यर्थ ही रहेंगी। इसी तरह चित्र में IQ, वक्र पर A2 बिन्दु तथा IQ3 वक्र पर A, बिन्दु भी ऐसे बिन्दु हैं जहाँ पर पूँजी की सीमान्त उत्पादकता शून्य है।

इसी तरह समोत्पाद मानचित्र में BI, B, तथा B बिन्दुओं पर श्रम की सीमान्त उत्पादकता शून्य है तथा इन बिन्दुओं के बाद समोत्पाद वक्र क्षैतिज (अर्थात x-अक्ष के समानान्तर) हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, इन बिन्दुओं के बाद पूँजी की मात्रा को स्थिर रखते हुए श्रम की इकाइयाँ बढ़ाने पर उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं होती। दूसरे शब्दों में, ये बिन्दु पूँजी का श्रम से प्रतिस्थापन की अधिकतम सीमा होते हैं। इन बिन्दुओं के बाद बढ़ाई गयी श्रम की इकाइयाँ व्यर्थ जाती हैं और वे उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं कर पाती हैं।

रिज रेखाएँ (Ridge Lines) : समोत्पाद वक्रों के बिन्दुओं के मार्ग, जहाँ पर साधनों की सीमान्त उत्पादकता शून्य है, रिज रेखाएँ बनाते हैं। समोत्पाद मानचित्र में दो रिज रेखाएँ होती हैं – पूँजी रिज रेखा और श्रम रिज रेखा। रिज रेखाएँ उत्पादन के आर्थिक क्षेत्र की सीमायें होती हैं। समोत्पाद मानचित्र पर A1, A, तथा A, बिन्दुओं को मिलाने से बनी OA रेखा पूँजी रिज रेखा (Capital Ridge Line) अथवा ऊपरी रिज रेखा (Upper Ridge Line) कहलाती है। इस रेखा पर पूँजी की सीमान्तं उत्पादकता शून्य होती है। इसी तरह BI, B, तथा B3 बिन्दुओं के मिलाने से बनी OB रेखा श्रम रिज रेखा (Labour Ridge Line) या निम्न रिज रेखा (Lower Ridge Line) कहलाती है। इस रेखा पर श्रम की सीमान्त उत्पादकता शून्य होती है।

दोनों रिज रेखाओं OA और OB के बीच के क्षेत्र में ही उत्पादन तकनीकें तकनीकी रूप से कशल होती हैं। इस क्षेत्र को उत्पादन का आर्थिक क्षेत्र (Viable or Economic Region of Production) अथवा उत्पादन का तकनीकी रूप से कुशल क्षेत्र (Technically efficient Main) कहते हैं। इस क्षेत्र में साधनों की सीमान्त उत्पादकता धनात्मक किन्त घटती हई होती। है। उत्पादन के इस कुशल क्षेत्र में समोत्पाद वक्त्र सामान्य आकार वाले अर्थात मूल बिन्दु की और उन्नतोदर होते हैं। एक विवेकशील उत्पादक अपने लाभों को अधिकतम करने के लिये सील में ही उत्पादन करेगा। इस प्रकार सभी न्यूनतम लागत वाले संयोग और विस्तार पथ निश्चित ही इन्हीं दोनों रिज रेखाओं के बीच में ही पड़ेंगे। इन रिज रेखाओं पर तकनीकी प्रतिस्थापन की सीमान्त दर (MRTS) स्थिर होती है।

रिज रेखाओं के बाहर साधनों की सीमान्त उत्पादकता ऋणात्मक होती है तथा उत्पादन की प्रणालियाँ अकुशल होती हैं क्योंकि पूर्ववत् उत्पादन स्तर के लिये दोनों साधनों की अधिक मात्राओं की आवश्यकता होती है। एक साधन की सीमान्त उत्पादकता के शून्य होने के बाद दूसरे साधन की मात्रा को स्थिर रखते हुए उस साधन की मात्रा बढ़ाई जाती है तो उस साधन की सीमान्त उत्पादकता ऋणात्मक हो जाती है, अतः उत्पादन स्तर गिर जाता है। अतः कोई भी विवेकशील उत्पादक दोनों रिज रेखाओं के बाहर साधन संयोग का चयन नहीं करेगा। दूसरे शब्दों में, रिज रेखाओं के बीच का क्षेत्र ही एक विवेकशील उत्पादक का क्रियाशीलता का क्षेत्र होता है।

Isoquants ISO Product Curve

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