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BCom 3rd Year Auditing Standards National International Study Material notes In hindi

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BCom 3rd Year Corporate Accounting Underwriting Study Material Notes in hindi

अंकेक्षण मानक : राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय

[AUDITING STANDARDS : NATIONAL AND INTERNATIONAL]

अंकेक्षण का अन्तिम उद्देश्य व्यावसायिक राय प्रकट करना है कि एक कम्पनी के वार्षिक वित्तीय खाते एक निश्चित तिथि पर उसकी वित्तीय स्थिति को सही और उचित रूप से प्रकट करते हैं तथा उस निर्धारित अवधि के लिए लेखाकर्म के सिद्धान्तों के अनुरूप सभी लेखे तैयार किये गये हैं। यह राय स्पष्टतः एक अंकेक्षक के ज्ञान, अनुभव और निर्णय पर निर्भर करती है अतः उसे अपनी राय प्रकट करने में यथोचित कुशलता और सावधानी का प्रयोग करना चाहिए। उसकी यह राय पर्याप्त, पूर्ण और उचित साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए, जिसे उसने सर्वमान्य अंकेक्षण मानकों के अनुसार अपने कार्य करने के उपरान्त बनाया है। ऐसे अंकेक्षण मानक निःसन्देह प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

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अंकेक्षण मानकों का अर्थ

(MEANING OF AUDITING STANDARDS)

अंकेक्षण मानक निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित होते हैं। इस प्रकार यह एक अंकेक्षण मानक है कि उपलब्ध सूचना के लिए अंकेक्षक के परीक्षणों का क्षेत्र उसको सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त होगा कि संस्था के सभी लेन-देन जो पुस्तकों में लिखे गये हैं वास्तव में किये गये हैं और उनका लेखाकर्म मानक (Accounting Standard) सही रूप से और उचित रूप से लेखों में रखा गया है।

अतः मानक किसी कार्य के करने का मापदण्ड है। कार्यकलाप की गुणवत्ता को नापने के लिए जो अधिकारपूर्ण नियम बनाये जाते हैं, वही मानक कहलाते हैं। सामान्य रूप से स्वीकृत अंकेक्षण मानकों की विद्यमानता इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती है कि अंकेक्षकों का सम्बन्ध अंकेक्षण कार्य के उच्च एवं समान गुणवत्ता बनाये रखने से है। यदि प्रत्येक प्रमाणित लोक-लेखापाल पर्याप्त रूप से अपने कार्य की तकनीकी जानकारी रखता है और यथोचित सावधानी और चतुराई से पूर्ण विवेक का प्रयोग करते हुए अंकेक्षण करता है तो ऐसा करने से अंकेक्षण के व्यवसाय की ख्याति अवश्य बढ़ती है और ऐसा होने पर वित्तीय विवरणों के सम्बन्ध में प्रकट की गयी अंकेक्षक की राय को जनता अत्यधिक महत्व देती है।

किसी व्यवसाय का अस्तित्व एवं ख्याति उसमें संलग्न उसके सदस्यों के दैनिक कार्य की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। कार्य की समान एवं उच्च गुणवत्ता जो व्यावसायिक वर्ग के द्वारा किया जाता है तब ही सम्भव होती है, जब निर्धारित मानकों को उस वर्ग के द्वारा मान्यता प्राप्त होती है और उनकी स्वीकृति होती। है। सामान्य रूप से स्वीकृत अंकेक्षण मानकों का विकास पिछली शताब्दी की लोक-लेखा व्यवसाय की एक बड़ी उपलब्धि रही है। इन मानकों के बिना इस व्यवसाय को बड़ी कठिनाई के साथ मान्यता मिली। यह मान्यता केवल निर्धारित मानकों की स्वीकृति से ही सम्भव हो सकी है।

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अंकेक्षण गतिविधियां बनाम अंकेक्षण मानक

(AUDITING PROCEDURES VS. AUDITING STANDARDS)

अकेक्षण गतिविधियां और अंकेक्षण मानक में अन्तर स्पष्ट है। अंकेक्षण गतिविधियां उस विस्तृत कार्य से सम्बन्ध रखती हैं जो अंकेक्षण मानकों के परिपालन अथवा क्रियाकलाप के परिपालन की दृष्टि से प्रयोग किये जाते हैं। इस प्रकार मानक उन मापदण्डों से सम्बन्ध रखते हैं जो विभिन्न कार्यों के पूर्ण करने की गुणवत्ता नापने के लिए प्रयोग किये जाते हैं जबकि गतिविधियां उन वास्तविक कार्यों से सम्बन्ध रखती हैं जो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सम्पन्न किये जाते हैं। अंकेक्षण मानक अंकेक्षक की व्यावसायिक गुणवत्ता पर निर्भर करते है और इनका सम्बन्ध उसके निर्णय लेने की कला से होता है जो वह अपनी जांच के समय तथा अपने विचारों की रिपोर्ट के रूप में प्रकट करने में प्रयोग करता है।

अतः व्यावसायिक संस्थाओं के सामान्य निर्णय पर अंकेक्षण की गतिविधियों का प्रयोग आधारित होता  है ।

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लोक-लेखा व्यवसाय द्वारा विकसित मानक

(STANDARDS DEVELOPED BY THE PUBLIC AUDITING PROFESSION)

अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ सर्टिफाइड पब्लिक एकाउण्टैण्ट्स कमेटी ऑन ऑडिटिंग प्रोसिजर (American Institute of Certified Public Accountants Committee on Auditing Procedure) ने अपने सामान्यतः स्वीकृत अंकेक्षण मानकों’ पर निर्गमित निर्देशन में निम्नलिखित तीन अंकेक्षण मानकों का विवरण दिया है।

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         अंकेक्षण मानक (Auditing Standards)

सामान्य                                         निहित कार्य                              रिपोर्ट देना

        (General )                                    (Field work)                                (Reporting)

() सामान्य मानक (General Standards)

तीन सामान्य मानक अंकेक्षक की व्यक्तिगत योग्यताएं और दायित्वों पर आधारित हैं। प्रायः इन मानकों को सक्षमता, निष्पक्षता और यथोचित सावधानी के मानक कहा जाता है वह निम्न प्रकार हैं :

(1) जांच ऐसे व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के द्वारा की जाती है जो अंकेक्षक के रूप में पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण और कुशलता रखते हैं।

(“The examination is to be performed by a person or persons having adequate technical training and proficiency as an auditor.”)

यह मानक शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुभव के महत्व की ओर संकेत करता है। एक व्यक्ति जो लेखाकर्म और अंकेक्षण के कार्य में आवश्यक तकनीकी प्रशिक्षण, शिक्षा और अनुभव नहीं रखता है वह अपने अंकेक्षण . के कार्य को सन्तोषजनक रूप में करने के लिए कभी भी सक्षम नहीं हो सकता है। वह न तो न्यायालय में मकदमा लड़ सकता है, न किसी पुल की डिजाइन तैयार कर सकता है और न ही शल्य चिकित्सा कर सकता है। अंकेक्षण का कार्य एक चतुराई पूर्ण व्यवसाय है जिसके लिए एक विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता होती है ताकि वास्तविक विषम परिस्थितियों में अनुभव के साथ इस ज्ञान का उपयोग किया जा सके। अंकेक्षक के पास लेखाकर्म और व्यापार से सम्बन्धित क्षेत्रों में ज्ञान का ठोस आधार होना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसके पास वह अनुभव भी होना चाहिए जिससे अंकेक्षण तकनीक और गतिविधियों के प्रयोग करने व चयन करने में तथा अंकेक्षण-साध्य के मूल्यांकन करने में अपना दृढ़ निर्णय पूर्णता के साथ ले सके।

उपर्यक्त विवरण से ज्ञात होता है कि यह सामान्य मानक यह स्पष्ट करता है कि अंकेक्षण के अन्तर्गत की गयी जांच केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो इस कार्य में पूर्ण दक्षता और सक्षमता रखता हो। यह सही है कि एक अंकेक्षक संस्था के बाहर का व्यक्ति है, पर देश की व्यवस्था के अनमयोग्यता और अनुभव होना चाहिए, जो अंकेक्षण कार्य के लिए आवश्यक है। यह मानव सर्वमान्य है जिसके स्वीकार करने में कोई दो राय नहीं हो सकती हैं।

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(2) अपने कार्य और दायित्व से सम्बन्धित सभी मामलों में अंकेक्षक अथवा अंकेक्षकों के द्वारा अपने। मानसिक दृष्टिकोण में स्वतन्त्रता बनाये रखी जानी चाहिए।

(“In all matters relating to the assignment, an independence in mental attitude is to be maintained by the auditor or auditors.”)

अंकेक्षक को अपने सभी निर्णयों में स्वतन्त्र और निष्पक्ष होना चाहिए क्योंकि उसकी राय पर सभी। व्यक्ति विश्वास करते हैं जो अंकेक्षित वित्तीय विवरण-पत्रों में विशेष रूप से रुचि रखते हैं, क्योंकि वे उनके हितों को प्रभावित करने वाले बहत निर्णयों के लेने में आधार बनते हैं। अंकेक्षक को पक्ष या विपक्ष में किसी पक्षपात या भय के बिना अपनी राय ईमानदारी से प्रकट करनी चाहिए। जो कार्य वह करता है वह ऐसा है। जिससे कि वह कम्पनी के प्रबन्ध में संलग्न व्यक्तियों के निकट सम्पर्क में प्रायः आता रहता है जिनके कार्य की वह आलोचनात्मक समीक्षा करता है और जिनके खातों की वह जांच करता है। यह ऐसे सम्पर्क को। बनाये रखने में आसान होता है जो उसकी भावनाओं को प्रभावित करते हैं। यदि इन भावनाओं से किसी भी प्रकार उसके नियोक्ता को प्रतिकूल प्रभाव डालने में किसी प्रकार का आभास होता है तो निश्चित रूप से वह अपने व्यवसाय के लिए अयोग्य माना जा सकता है। अतः उसका दृष्टिकोण बड़ा व्यापक और समान होना चाहिए। नियोक्ता उससे पूर्ण परिचित हों अथवा नहीं और चाहे प्रबन्ध में संलग्न व्यक्ति सक्षम और ईमानदार हों अथवा नहीं, उसे अपने आपको पूर्णतः उन व्यक्तियों से स्वतन्त्र समझना चाहिए, जिनके सम्पर्क में वह खातों का अंकेक्षण करते समय आता है। उसको लेखाकर्म के आंकड़ों की जांच करते समय उसी प्रकार आलोचक होना चाहिए जिस प्रकार किन्हीं अपरिचित व्यक्तियों के मध्य वह अपना व्यवहार रखता है।

इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक अंकेक्षक को खातों की जांच करते समय पूर्णरूपेण निष्पक्ष और स्वतन्त्र बने रहना चाहिए। उसका कार्य आलोचनात्मक है। अपने कार्य में उसे मित्रता निभाने की गुंजाइश नहीं है।

(3) जांच के कार्य में और रिपोर्ट के तैयार करने में उचित व्यावसायिक सावधानी बरतनी चाहिए।

(“Due professional care is to be exercised in the performance of his examination and the preparation of his report.”)

अंकेक्षक कार्य एक व्यावसायिक पेशा है जिसके लिए उच्च स्तर के तकनीकी ज्ञान और चतुराई की आवश्यकता है। जो व्यक्ति या संस्थाएं अंकेक्षक की राय पर विश्वास करते हैं महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने में सक्षम बन सकते हैं। इसके अतिरिक्त उन व्यक्तियों या संस्थाओं के लिए वह एक बड़ा वैधानिक दायित्व स्वीकार करता है जिनके हित के संरक्षण के लिए उनका प्रतिनिधि होकर वह अंकेक्षण करता है; ये व्यक्ति अंकेक्षक की स्वतन्त्र, स्पष्ट और निष्पक्ष राय से प्रभावित होते हैं। अतः अंकेक्षक से यह आशा की जाती है कि वह अपने कार्य में यथोचित सावधानी और चतुराई का प्रयोग करेगा।

यथोचित सावधानी और चतुराई की सीमा क्या होगी यह उसके विवेक और कार्य की परिस्थितियों पर निर्भर होगा। न्यायालयों के निर्णय यह प्रमाणित करते हैं कि यदि अंकेक्षक का दोष होने पर यह सिद्ध हो जाये कि उसने अपने कार्य में यथोचित सावधानी और चतुराई का प्रयोग किया है तो न्यायालयों ने उसको दोषारोपण से मुक्त कर दिया है। नियमानुसार अंकेक्षक अपना वैधानिक दायित्व यदि स्वीकार करता है और अपने कार्य को पूर्ण करने में पूर्ण निष्ठा और सतर्कता का प्रयोग करता है तो वह किसी भी प्रकार से दोषी नहीं बन सकता। यही इस मानक का प्रमुख आधार है

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(ब) निहित कार्य के मानक (Standards of Field Work)

(1) कार्य पर्याप्त रूप से नियोजित किया जाना चाहिए और यदि कोई सहायक हो, तो उचित रूप से पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए।

(The work is to be adequately planned and assistants, if any, are to be properly supervised.)

यह मानक यह स्पष्ट करता है कि एक अंकेक्षक को अपना अंकेक्षण कार्य पूर्ण नियोजित ढंग से करना । चाहिए। इसका अर्थ यह है कि अंकेक्षक को अपने कार्य की सीमा और क्षेत्र प्रारम्भ में ही तय कर लेना। चाहिए और जांच की विभिन्न क्रियाओं के द्वारा जैसे, अंकेक्षण कार्यक्रम, आदि अपने समय और स्टाफ की। संख्या का ध्यान रखते हुए उचित योजना का निर्माण करना चाहिए। यह कार्य की कुशलता, समय की बचत और निपुणता की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक है।  यह ही नहीं. यदि अंकेक्षक के साथ उसके सहायक कार्यरत हैं, तो उन सहायकों के कार्यों का निरीक्षण और पर्यवेक्षण उचित रीति से किया जाना चाहिए। कितना पर्यवेक्षण पर्याप्त होगा, यह उसके विवेक और कार्य पद्धति पर निर्भर होगा।

(2) प्रचलित आन्तरिक नियन्त्रण का जो विश्वसनीयता के लिए आधार माना जाता है, मूल्यांकन और उसका उचित अध्ययन किया जाना चाहिए तथा परीक्षणों की सीमा के निर्धारण के लिए यह नियन्त्रण आवश्यक होता है, जिन परीक्षणों के लिए अंकेक्षण गतिविधियां बन्धित करती हैं।

(There is to be a proper study and evaluation of the existing internal controls as a basis for reliance thereon and for the determination of the resultant extent of the tests to which auditing procedures are to be restricted.)

यह मानक आन्तरिक नियन्त्रण के अध्ययन और मल्यांकन की. जो इसकी विश्वसनीयता के परीक्षण के लिए आधार बनता है, आवश्यकता और महत्व पर जोर देता है। इसके द्वारा अंकेक्षक अपने कार्य के लिए उचित गतिविधियों का निर्माण भी कर सकता है। आन्तरिक नियन्त्रण की छानबीन करने के उपरान्त अंकेक्षक अपना अंकेक्षण कार्यक्रम तैयार कर सकता है और कार्य की योजना बनाकर सफलता के साथ कार्य सम्पन्न कर सकता है।

एक सुदृढ़ एवं कुशल आन्तरिक नियन्त्रण की पद्धति से अंकेक्षक को यह आश्वासन मिल सकता है। कि खातों में अशुद्धियां और छल-कपट या तो स्वतः ही रुक जायेंगे अन्यथा नैतिक क्रियाओं के होने में प्रकाश में आ जायेंगे, जिससे उनका सुधार सम्भव हो सकेगा और खातों की शद्धता व विश्वसनीयता बनी रहेगी। इस प्रकार यदि अंकेक्षक आन्तरिक नियन्त्रण की प्रचलित पद्धति को सन्तोषजनक समझता है तो वह यह कह सकता है कि पद्धति विश्वसनीय है और इसके अन्तर्गत प्रस्तुत आंकड़े सही हैं। उसे यह मालूम करना चाहिए कि आन्तरिक नियन्त्रण की प्रणाली नियोजित ढंग से कार्य कर रही है। निःसन्देह इन नियन्त्रणों को सही मापदण्डों के अन्तर्गत उसे तौलना चाहिए और व्यवसाय की परिस्थितियों के अनुरूप उनकी पर्याप्तता और दृढ़ता का मूल्यांकन करना चाहिए जिससे कि वह सामान्य रूप से स्वीकृत अंकेक्षण मानकों के अनुरूप अपनी जांच का कार्य पूर्ण निष्ठा और सक्षमता के साथ सम्पन्न कर सके।

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(3) निरीक्षण, समीक्षा, पूछताछ और सम्पुष्टिकरण के द्वारा पर्याप्त पूर्ण साक्ष्य-सामग्री प्राप्त की जानी चाहिए जिससे अपने द्वारा परीक्षित वित्तीय विवरणों के सम्बन्ध में अपनी राय का उचित आधार तैयार हो सके।

(Sufficient competent evidential matter is to be obtained through inspection, observation, inquiries and confirmation to afford a reasonable basis for an opinion regarding the financial statements under examination.)

यह मानक अंकेक्षण सम्बन्धी साक्ष्य के महत्व पर ही जोर नहीं देता बल्कि उन उपायों के सम्बन्ध में सुझाव भी देता है जिनसे साक्ष्य इकट्ठे किये जा सकते हैं। अंकेक्षण एक व्यावहारिक क्रिया है जो विशिष्ट और वास्तविक परिस्थितियों में साक्ष्य और सबूत की व्यावहारिकता की आवश्यकता पर जोर देती है। कुछ आधारभूत तरीकों से साक्ष्य व प्रमाण एकत्रित किये जाने चाहिए जो निम्न हो सकते है

(1) भौतिक जांच अथवा गणना,

(2) पुष्टीकरण,

(3) अधिकृत प्रपत्रों की जांच और लेखों से उनकी तुलना.

(4) समाधान (Reconciliation),

(5) अध्ययन,

(6) जांच-पड़ताल अथवा पूछताछ,

(7) सहायक लेखों की जांच,

(8) आवश्यक क्रियाओं और शर्तों का निरीक्षण.

(9) सम्बन्धित सूचना से सह-सम्बद्धीकरण.

(10) पुस्तपालन गतिविधियों की समीक्षा,

(11) पुनर्गणना,

(12) निरीक्षण।

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