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BCom 3rd Year Tax Audit Study Material notes In hindi

BCom 3rd Year Tax Audit Study Material notes In hindi

BCom 3rd Year Tax Audit Study Material notes In hindi : Definition of Tax Audit Compulsory Tax Audit Accounting Appointment of Tax Auditor Meaning of Gross receipts Limit of Acceptance of Tax Audits  Tax Audit in Other Cases ( Most Important Notes for BCom Students )

BCom 3rd Year Tax Audit Study Material notes In hindi
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कर अंकेक्षण

[TAX AUDIT]

व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा बनाए गए वित्तीय विवरण संस्था के मालिकों के लिए व्यवसाय के नियन्त्रण व निर्णय प्रक्रिया में काफी सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त, इन वित्तीय विवरणों में कई अन्य पक्षकार; जैसे—विनियोगकर्ता, बैंक, लेनदार व पूर्तिकर्ता, कर अधिकारीगण व श्रम प्रतिनिधियों का भी हित निहित रहता है। ये वित्तीय विवरण समस्त पक्षकारों की आवश्यकताओं की पूर्ति पर्याप्त रूप से करने में सक्षम नहीं होते। अतः संस्थाओं को यह परामर्श दिया जाता है कि महत्वपूर्ण व सम्बन्धित सूचनाओं के लिए विशेष विवरण बनाया जाए जिनका अंकेक्षण पेशेवर लेखांकन कर्ताओं द्वारा किया गया हो।

आयकर अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत इस उद्देश्य हेतु कुछ विशेष प्रावधान [धारा 12A, 35D, 44AB, 80HH, 80HHA, 80HHB, 80-I, 142 (2A)] बनाए गए हैं तथा ये समस्त प्रावधान हमारे देश में कर-निर्धारण वर्ष 1985-86 से अनिवार्य रूप से लागू कर दिए गए है।

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कर अंकेक्षण की परिभाषा

(DEFINITION OF TAX AUDIT)

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था वित्तीय वर्ष के अन्त में कम्पनी के सदस्यों के अवलोकन व सूचनार्थ, अन्तिम खाते तैयार कर प्रेषित करते हैं। ये वित्तीय खाते व्यवसाय की वित्तीय स्थिति के सही व शुद्ध होने को प्रमाणित करते हैं। ये लेखे पेशेवर लेखापालकों द्वारा अंकेक्षित किए जाते हैं जिनकी शुद्धता, वैधता व प्रामाणिकता को सत्यापित कर व्यवसाय के मालिकों अर्थात् अंशधारियों को प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इन लेखों के आधार पर कर का निर्धारण कैसे किया जाए यह तब तक सम्भव नहीं है जब तक इन लेखों का अंकेक्षकों द्वारा निरीक्षण न कर लिया जाए व कर अधिकारियों को सौंप नहीं दिया जाता। अतः यह आवश्यक है कि वित्तीय लेखों का आयकर अधिनियम, 1961 के प्रावधानों के अन्तर्गत कर-निधारण हेतु लेखों का अंकेक्षकों द्वारा अंकेक्षण किया जाए। वित्तीय लेखों का कर हेतु निरीक्षण व जांच कराना ही कर अंकेक्षण (Tax Audit) कहलाता  है

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अनिवार्य कर अंकेक्षण (COMPULSORY TAX AUDIT)

प्रत्येक ऐसा व्यक्ति : (a) जो व्यवसाय करता है और उसके व्यवसाय का कुल विक्रय या सकल प्राप्ति, दोनों में से कोई भी गत वर्ष में 40 लाख र से अधिक हो,या

(b) जो पेशे में हैं व उनकी पेशेवर आय गत वर्ष में 10 लाख र से अधिक है, या

(c) जो व्यवसाय कर रहा है व व्यवसाय से अर्जित लाभ धारा 44AD, 44AE व 44AF के अन्तर्गत, लाभ उस व्यक्ति के लिए माना गया है व उसने यह दावा किया है कि उसकी आय माने गए व्यवसाय से प्राप्त लाभ से गत वर्ष में कम है तो ऐसे व्यक्ति को अपने गत वर्ष के लेखों का अंकेक्षण निर्धारित तिथि से पूर्व कराकर उसकी अंकेक्षित रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप में तैयार कर उसे पूर्ण रूप से सत्यापित व हस्ताक्षर करके तैयार कराना होगा।

ये धाराएं उन व्यक्तियों पर लाग नहीं होंगी जिनकी आय धारा 44B, 44BB, 44BBA व 44BBBI के अन्तर्गत वर्णित आय की प्रकृति से सम्बन्धित है और उन्होंने यह आय 1 अप्रैल, 1985 को या उसके पश्चात् या जिस तिथि को ये धाराएं प्रभावित की गई थीं, जो दोनों में से पहले है, कमाई गई थी।

इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि किसी व्यक्ति को कम्पनी अधिनियम या अन्य कोई अधिनियम के अन्तर्गत खातों का अंकेक्षण कराना है तो उसे आयकर अधिनियम की विभिन्न धाराओं के प्रावधानों का पर्याप्त पालन करना होगा यदि वह व्यक्ति अपने व्यवसाय या पेशे की आय का अंकेक्षण किसी अधिनियम के अन्तर्गत कराता है। यह अंकेक्षण निर्धारित तिथि से पूर्व कराकर उसकी रिपोर्ट उस अधिनियम के अधीन व इन धाराओं के अन्तर्गत बनाकर पेश करनी होगी।

स्पष्टीकरण इन धाराओं के लिए ::

(i) एकाउण्टैण्ट का वही अर्थ लिया जाएगा जो नीचे धारा 288 की उप-धारा (2) में वर्णित है।

(ii) ‘निर्धारित तिथि’ करदाता के गत वर्ष के खाते से सम्बन्धित कर निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारित

तिथि का आशय है :

(a) यदि करदाता कम्पनी है तो कर निर्धारण वर्ष की 30 नवम्बर।

(b) अन्य दशाओं में कर-निर्धारण वर्ष की 30 अक्टूबर।

एकाउण्टैण्ट (Accountant)

धारा 44AB व विशिष्ट विवरणों के अंकेक्षण हेतु धारा 12A, 35D, 35E, 80HHB, 80HHC, 80HHD, 80HHE-80-1, 80-IA, 80-1B तथा 142 (2A) में एकाउण्टेण्ट शब्द से आशय है चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट अधिनियम, 1949 के अन्तर्गत चार्टर्ड एकाउन्टैण्ट से है व कम्पनी अधिनियम, 1956 की धारा 226 की उप-धारा (2) के अन्तर्गत उस राज्य में रजिस्टर्ड कम्पनी में अंकेक्षक के पद पर नियुक्त करने के योग्य हो।

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कर अंकेक्षक की नियुक्ति (Appointment of Tax Auditor)

चार्टर्ड एकाउन्टैण्ट अधिनियम, 1949 की धारा 7 के अन्तर्गत कर अंकेक्षण केवल कार्यरत चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट के द्वारा ही किया जा सकता है। एक नए चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट को इस कार्य की स्वीकृति देने से पूर्व गत वर्ष के अंकेक्षक से जिसने यह कार्य पहले किया है उसे इस आशय के सम्बन्ध में सूचित करना आवश्यक है। आयकर अधिनियम के अन्तर्गत छूट व कटौतियां लेने के उद्देश्य से कर अंकेक्षणं व विभिन्न विवरणों के अंकेक्षण के लिए संस्था के प्रबन्धकों द्वारा या करदाता द्वारा स्वयं एक एकाउण्टैण्ट की नियुक्ति की जा सकती है। कम्पनी की दशा में, संचालक मण्डल या मुख्य कार्यकारी अधिकारी संचालक मण्डल के लिए, कर अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकते हैं। इसी तरह एकाकी व्यवसाय के मालिक द्वारा व साझेदारी फर्म में साझेदारों द्वारा या उनके द्वारा अधिकृत कोई अन्य व्यक्ति अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकता है।

व्यवसाय या पेशे की परिभाषा (Definition of Business and Profession)

आयकर अधिनियम की धारा 2(13) के अनुसार ‘व्यवसाय’ से आशय कोई भी व्यापार, वाणिज्य व निर्माण या कोई उपक्रम या कोई ऐसी संस्थाओं से है जो व्यापार, वाणिज्य या निर्माणी प्रकृति से सम्बन्धित हैं। आयकर अधिनियम की धारा 44AA(1) के अन्तर्गत, प्रत्येक ऐसा व्यक्ति को जो न्यायिक, मेडिकल, इंजीनियरिंग (अभियान्त्रिकी) या आर्किटेक्ट से सम्बन्धित पेशे में संलग्न है या लेखांकन या तकनीकी सलाहकार। या आन्तरिक साज-सज्जा के पेशे में या कोई अन्य पेशा जो बोर्ड द्वारा सरकारी गजट में इस उद्देश्य हेतु सूचित किया गया है, अपने पेशे से सम्बन्धित लेखा पुस्तकों व अन्य प्रपत्रों को रखना आवश्यक है जिससे । कि कर-निर्धारण अधिकारी इस अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत उसकी कुल आय की गणना कर सका।

धारा 44AA(2) के अन्तर्गत, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को जो कि व्यापार या पेशा चला रहा है [उप-धारा (1) के अन्तर्गत दिए पेशे न होने पर] को चाहिए :

(i) यदि उसके व्यापार या पेशे से आय 1,20,000 ₹ से अधिक या कल विक्रय, कल आवर्त या सकल । प्राप्ति, जो भी दशा हो, व्यापार या पेशे के अन्तर्गत 10 लाख ₹ से गत वर्ष से पूर्व के किसी भी तीन वर्षा। में ज्यादा हो, या कर अंकेक्षण

(ii) यदि गत वर्ष में नये व्यापार या पेशा की स्थापना की गई है और ऐसी सम्भावना हक उसप व्यापार या पेशे से आय 1,20,000 ₹ से ज्यादा या कल विक्रय, कुल आवर्त या कुल प्राप्ति, जो भा’ हो. व्यापार या पेशे में गत वर्ष में 10 लाख से अधिक हो।

(iii) व्यापार से प्राप्त आय व लाभ धारा 44AD 44AE या 44AF के अन्तर्गत करदाता का आया या लाभ के रूप में मानी गई, जो भी दशा हो और करदाता ने यह दावा किया है कि गत वर्ष में उसका आय मानी गई आय व लाभों से कम है।

(iv) वे समस्त लेखा पुस्तकें व अन्य प्रपत्र रखे गए हैं जो कर-निर्धारण अधिकारी को उसकी कुल आय की गणना करने के लिए इस अधिनियम में आवश्यक हैं।

यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय एवं पेशे में एकसाथ संलग्न है, तो उस पर धारा 44AB तभी लागू होगी जबकि :

(i) पेशे से प्राप्तियां 10 लाख र से अधिक हों, अथवा

(ii) व्यवसाय की बिक्री 40 लाख र से अधिक हो।

यदि किसी व्यक्ति की व्यवसाय एवं पेशे से सकल प्राप्तियां निर्धारित मौद्रिक सीमाओं से कम हो तो वह व्यक्ति धारा 44AB के अन्तर्गत शामिल नहीं किया जाएगा चाहे उसकी व्यवसाय एवं पेशे से सकल प्राप्तियां 40 लाख से अधिक ही क्यों न हों।

बिक्रीएवं आवर्त से आशय (Meaning of ‘Sales’ and ‘Turnover’)

‘विक्री’ एवं ‘आवर्त’ शब्द आयकर विधान द्वारा परिभाषित नहीं किए गए हैं। यद्यपि इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट्स ऑफ इण्डिया द्वारा निर्गमित विभिन्न प्रलेखों के आधार पर ‘बिक्री’ को निम्नांकित रूप में निर्वचन किया जा सकता है :

  • बिक्री में अवशिष्ट एवं सह-उत्पाद की बिक्री शामिल होती है।
  • व्यापारिक छूट, विक्रय वापसी, मूल्य समायोजन एवं बिलों का निरस्तीकरण विक्रय में से घटाया जाता है।
  • नकद छूट, कमीशन, अपलिखित अप्राप्य ऋण, आदि को विक्रय में से नहीं घटाया जाता है। ये सभी मदें लाभ-हानि खाते के ऋणी पक्ष में दिखाई जानी चाहिए।
  • विक्रय कर एवं शुल्क विक्रय में तभी सम्मिलित किए जाने चाहिए जब वे विक्रय मूल्य का एक भाग हों। यदि उनको अलग से वसूला जाता है, तो उन्हें बिक्री का भाग नहीं माना जाएगा।
  • पैकिंग, भाडा एवं अन्य सम्बन्धित व्यय भी बिक्री में शामिल नहीं किए जाते हैं यदि उन्हें बिलों में पृथक् रूप से दिखाया गया हो।
  • स्थायी सम्पत्ति एवं अन्य विनियोग हेतु सम्पत्ति की बिक्री से प्राप्त राशि भी विक्रय में शामिल नही की जाती है। ‘

सकल प्राप्तियोंसे आशय (Meaning of Gross Receipts)

आयकर अधिनियम की धारा 44AB के अन्तर्गत, इंस्टीट्यूट द्वारा निर्गमित कर अंकेक्षण से सम्बन्धित दिशा निर्देशों के अनुसार, व्यवसाय एवं पेशे के सन्दर्भ में सकल प्राप्तियों से आशय उन सभी प्राप्तियों से है जो व्यवसाय एवं पेशे के माध्यम से ही अर्जित की जाती हैं एवं जिनका निर्धारण आयकर अधिनियम के अन्तर्गत किया जा सकता है।

आयकर अधिनियम की धारा 28 के अनुसार, व्यवसाय एवं पेशे के लाभ एवं प्राप्तियों में निम्नांकित सम्मिलित होते हैं :

-आयात लाइसेंस की बिक्री पर लाभ

नकद रोकड़ सहायता (निर्यात के सन्दर्भ में)

साझेदार को देय ब्याज/वेतन/बोनस/कमीशन अथवा वेतन

बीमा दावे आदि।

व्यक्ति जो धारा 44AB में शामिल किए जाते हैं (Persons Covered by Sec. 44AB)

आयकर विधान में निर्धारित परिभाषा में सम्मिलित व्याक्तियों को ही अपने लेखों का अंकेक्षण कराना होता है। उन्हें ऐसा करना तभी आवश्यक होगा जब उनकी सकल बिक्री अथवा प्राप्तियां निर्धारित सीमाओं से अधिक हों। यदि उन्हें कोई आंशिक अथवा पूर्ण छूट, आयकर नियम के किसी प्रावधान के अन्तर्गत दी जाती है एवं उनकी करयोग्य आय न्यनतम करयोग्य आय से कम है तो भी उनके लिए धारा 44AB के प्रावधानों का पालन करना आवश्यक होगा। उदाहरण के लिए, एक सहकारी समिति एवं धर्मार्थ ट्रस्ट धारा 44AB के अन्तर्गत शामिल किए जाएंगे यदि उनकी कल बिक्री अथवा सकल प्राप्तियां 40 लाख से अधिक हों, हालांकि उन्हें कर देना आवश्यक नहीं है।

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दण्ड (Penalty)

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 271B के अन्तर्गत यदि कोई व्यक्ति किसी भी गत वर्ष या । कर-निर्धारण वर्ष से सम्बन्धित गत वर्ष के लेखों का अंकेक्षण कराने में असमर्थ रहा है या ऐसे अंकेक्षण की रिपोर्ट प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है जो धारा 44AB के अन्तर्गत आवश्यक थी, तो कर-निर्धारण अधिकारी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को दण्डस्वरूप, कल विक्रय का या कुल आवर्त या सकल प्राप्ति का 0.5% भुगतान करने का आदेश दे सकता है चाहे वह गत वर्ष या वर्षों में व्यापार या पेशे से प्राप्ति हो या 1,00,000 ₹. जो दोनों में कम हो।

कर अंकेक्षण की स्वीकृति की सीमा (Limit of Acceptance of Tax Audits)

इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट ने एक चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट द्वारा किसी भी वित्तीय वर्ष में स्वीकार किए जाने वाले कर अंकेक्षणों की संख्या निर्धारित की है। एक व्यक्तिगत चार्टर्ड एकाउन्टैण्ट, 30 से अधिक कर अंकेक्षण किसी भी वित्तीय वर्ष में स्वीकार नहीं कर सकता। फर्म की दशा में प्रत्येक साझेदार 30 से अधिक कर अंकेक्षण व्यक्तिगत रूप से स्वीकार नहीं कर सकते। यदि कोई एक साझेदार एक से अधिक फर्म में चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट है तो इस दशा में वह कुल मिलाकर 30 कर अंकेक्षण ही स्वीकार कर सकता है।

कर अंकेक्षण के लिए करदाता कम्पनी या गैर-कम्पनी भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त प्रधान कार्यालय का कर अंकेक्षण व उनकी शाखाओं का कर अंकेक्षण इस उद्देश्य हेतु एक (one) कर अंकेक्षण गिना जाएगा। यदि कर अंकेक्षण दो फर्मों द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है तो संख्या की दृष्टि से यह एक (one) कर अंकेक्षण फर्म के लिए माना जाएगा।

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कर अंकेक्षण रिपोर्ट (Tax Audit Report)

आयकर अधिनियम के नियम 6G के अनुसार धारा 44AB के अन्तर्गत किए गए कर अंकेक्षण की रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप में दाखिल करनी होती है।

(1) एक व्यक्ति जो किसी व्यापार को चलाता है एवं उसके लिए किसी अन्य अधिनियम के अन्तर्गत लेखों का अंकेक्षण आवश्यक है तो कर अंकेक्षण रिपोर्ट फॉर्म संख्या 3-CA में जमा करनी होती है एवं विवरणों का एक प्रपत्र फॉर्म 3-CD रिपोर्ट में संलग्न करना होता है।

(2) एक व्यक्ति जो किसी व्यापार को चलाता है, लेकिन उसके लिए किसी अन्य अधिनियम के अन्तर्गत लेखों का अंकेक्षण आवश्यक नहीं है, तो कर अंकेक्षण रिपोर्ट फॉर्म 3-CB एवं विवरणों का एक प्रपत्र फॉर्म 3-CD में जमा करना होता है।

(3) यदि व्यक्ति किसी पेशे में संलग्न है तो कर अंकेक्षण रिपोर्ट फॉर्म संख्या 3-CC एवं विवरणों का । प्रपत्र फॉर्म संख्या 3-CE संलग्नक के रूप में जमा करने होते हैं।

अन्य दशाओं में कर अंकेक्षण

(TAX AUDIT IN OTHER CASES)

1 सार्वजनिक ट्रस्ट का अंकेक्षण (Audit of Public Trust) आयकर अधिनियम, 1961 की धारा। 12A के अन्तर्गत सार्वजनिक ट्रस्टों के कर अंकेक्षण की व्यवस्था की गई है। धारा 11 व 12 के अन्तर्गत, सार्वजनिक ट्रस्टों की कुछ विशेष आय सार्वजनिक ट्रस्टों की कल आय निर्धारण करने में कर मुक्त रखी गई। है।धारा 12A(b) के प्रावधानों के अनुसार धारा 11 व 12 के प्रावधानों को प्रभावित किए बगैर यदि इन ट्रस्टो एवं संस्थाओं की इस अधिनियम के अन्तर्गत गणना की गई कल आय किसी भी गत वर्ष में 50.000 ₹स। धिक होती है तो उन वर्षों के लिए ट्रस्ट या ऐसी संस्थाओं को अपने खाते एकाउण्टैण्ट द्वारा अंकेक्षित कराये जाने चाहिए व इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप में पूर्ण रूप से अंकेक्षक द्वारा सत्यापित व हस्ताक्षरित। की जानी चाहिए।

आयकर अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत यह कर रिपोर्ट फॉर्म नं. 10B पर बनाई जानी चाहिए व इससे सम्बन्धित एक विवरण इसके साथ संलग्न किया जाना चाहिए।

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2. धारा 35D व 35E के अन्तर्गत छुट के दावे करना-आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 35D के अन्तर्गत प्रारम्भिक व्ययों के सम्बन्ध में प्रावधान किए गए हैं जो व्यावसायिक उपक्रम के विस्तार के सम्बन्ध में किए गए व्यय या कोई नई औद्योगिक इकाई की स्थापना पर व्यय किए गए हैं। इन धाराओं के प्रावधानों के अन्तर्गत करदाता को इन प्रारम्भिक व्ययों के 1/10 भाग के बराबर की राशि को व्यवसाय के प्रारम्भ किए गए वर्ष से लगातार 10 वर्षों तक या उस गत वर्ष से जबकि व्यवसाय का विस्तार पूर्ण किया गया है या नए व्यवसाय की उत्पादन क्रियाएं प्रारम्भ की गई थीं उस तिथि से प्राप्त किया जा सकता है।

इस अधिनियम की धारा 35E छूट प्राप्त करने के तरीके का वर्णन करती है जो खनिज संसाधनों के खदान या उनके उत्पादन पर किए गए व्ययों से सम्बन्धित है। इन खनिज संसाधनों की सूची जिनके सम्बन्ध में यह छूट प्राप्त की जा सकती है उनका वर्णन आयकर अधिनियम की सातवीं अनुसूची में किया गया है।

उपर्युक्त दोनों धाराएं यह वर्णित करती हैं कि कम्पनी व सहकारी संस्थाओं को छोड़कर अन्य करदाताओं के लिए यह छूट तभी स्वीकृत होगी जबकि लेखों का अंकेक्षण एक एकाउण्टेण्ट द्वारा कराया गया है व उसकी अंकेक्षित रिपोर्ट फॉर्म 3-B पर नियम संख्या 6AB के अनुसार तैयार की गई है व इस सम्बन्ध में उसके साथ इस आशय का एक विवरण संलग्न है।

3. पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना पर-छूट (Deductions for setting up Industries in Backward Areas) आयकर अधिनियम की धारा 80HH के अन्तर्गत उन करदाताओं को कुल आय में से छूट स्वीकृत की गई है, जो पिछड़े क्षेत्रों में नए औद्योगिक उपक्रम की स्थापना करते हैं या वहां पर होटल की स्थापना करते हैं। यह छूट ऐसे व्यवसायों से कमाए गए लाभ या आय के 20% के बराबर स्वीकृत है। कम्पनी व सहकारी संस्थाओं को छोड़कर अन्य करदाताओं को यह छूट तब उपलब्ध होगी जब उनके गत वर्ष के लेखे अंकेक्षित होंगे व इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट जारी की जा चुकी है।

आयकर अधिनियम के नियम संख्या 18B के अनुसार यह अंकेक्षित रिपोर्ट फॉर्म 10C पर तैयार की जानी चाहिए।

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4. धारा 80HHB के अन्तर्गत स्वीकृत छूट (Deductions allowed u/s 80HHB) आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80HHB के अनुसार यदि कोई भारतीय कम्पनी या कोई ऐसा व्यक्ति जो भारत का निवासी है और वह भारत के बाहर किसी प्रोजेक्ट से कोई लाभ या आय अर्जित करता है तो उसे उसके लाभ या आय में से कुछ भाग छूट के रूप में स्वीकृत किया जाएगा जो बराबर होगा :

(i) प्रारम्भ होने वाले कर-निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल, 2001 के लिए 40%

(ii) प्रारम्भ होने वाले कर-निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल, 2002 के लिए 30%

(iii) प्रारम्भ होने वाले कर निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल, 2003 के लिए 20%

(iv) प्रारम्भ होने वाले कर निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल, 2004 के लिए 10%

1 अप्रैल, 2005 से प्रारम्भ होने वाले कर निर्धारण वर्ष व उसके पश्चात् के वर्षों में कोई भी छूट स्वीकृत नहीं की गई है।

इस छूट को प्राप्त करने हेतु कुछ आवश्यक शर्तों को पूरा करना करदाता के लिए अति आवश्यक है जिसके पूर्ण होने पर ही करदाता छूट प्राप्त करने के योग्य होगा।

आयकर अधिनियम के नियम संख्या 18BBA के अनुसार खातों को एक एकाउण्टैण्ट के द्वारा जांच करने के पश्चात ही अंकेक्षित रिपोर्ट फॉर्म 10-CCA में की जाएगी।

यह प्रावधान कम्पनी व सहकारी संस्थाओं पर लाग नहीं होता क्योंकि इन संस्थाओं को अपने खातों का अंकेक्षण कराना अनिवार्य होता है।

5. धारा 80-1 के अन्तर्गत अंकेक्षण (Audit under Section 80-I) आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80-I के प्रावधानों के अनुसार जब किसी करदाता की सकल कुल आय में ऐसा लाभ या आय शामिल है जो उसने एक औद्योगिक उपक्रम से या जहाज या होटल व्यवसाय या समुद्र में जाने वाले ऐसे जलयान । या ऐसे शक्ति उद्योग से अर्जित किए हैं जिस पर यह धारा प्रभावी होती है उन्हें उसकी कुल आय की गणना करने में ऐसे कमाए गए लाभ या आय का 20% के बराबर छूट प्रदत्त की जाएगी।

यह छूट तभी प्रदत्त की जाती है जबकि गत वर्षों के खातों का अंकेक्षण करा लिया गया है व करदाता द्वारा इस आशय की रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है।

6. धारा 80-IA के अन्तर्गत अंकेक्षण (Audit under Section 80-IA) धारा 80-IA के अन्तर्गत स्वीकृत कटौती उन करदाताओं को प्रदान की जाती है जो अपने लाभ या आय ऐसे चुने हुए व्यापार (Eligible business), जैसे—एक औद्योगिक उपक्रम, शीतगृह, जहाज के संचालन या होटल व्यवसाय से प्राप्त की गई है और ऐसे व्यवसाय को 31 मार्च, 1991 के पश्चात् संचालित किया गया है।

दी जाने वाली छूटे हैं :

(i) औद्योगिक उपक्रम के लिए लाभों का 25%

(ii) यदि व्यावसायिक उपक्रम कम्पनी द्वारा लिया गया है—लाभों का 30%

यह छूट 10 वर्षों तक स्वीकृत है परन्तु सहकारी संस्थाओं के लिए यह छूट व्यवसाय प्रारम्भ करने वाले गत वर्ष से 12 वर्षों तक के लिए मान्य है।

इनके अतिरिक्त इस छूट को प्रदान करने के लिए एक आवश्यक शर्त यह है कि इन औद्योगिक उपक्रमों का अंकेक्षण किया जा चुका है व इस आशय की रिपोर्ट फॉर्म 10-CCB पर आयकर नियम संख्या 18BBB के अन्तर्गत करदाता द्वारा प्रेषित की जा चुकी है।

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7. चयनित हुआ कर अंकेक्षण (Selective Tax Audit)-आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 142 की उप-धाराएं 2A, 2B, 2C व 2D के कुछ प्रावधान इस आशय से दिए गए हैं :

2A किसी कार्यवाही के किसी भी स्तर पर यदि कर-निर्धारण अधिकारी के विचारानुसार करदाता के खातों की प्रकृति व जटिलता को देखते हुए आय के हित के लिए मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर से पूर्व स्वीकृति लेकर धारा 288 की उप-धारा (2) के स्पष्टीकरण के तहत खातों का अंकेक्षण ऐसे एकाउन्टैण्ट से कराया जा सकता है जिसको मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर ने नियुक्त किया है व ऐसे अंकेक्षण की एक रिपोर्ट निर्धारित प्रारूप पर पूर्ण रूप से हस्ताक्षरित व प्रमाणित कर दी गयी है।

2B–उप-धारा (2A) के प्रावधान के अन्तर्गत यह प्रभाव मान्य नहीं होगा कि खातों का अंकेक्षण किसी और अधिनियम के अन्तर्गत करा लिया गया है।

2c उप-धारा (2A) के अनुसार करदाता द्वारा समस्त रिपोर्ट कर-निर्धारण अधिकारी को निर्धारित समय के अन्तर्गत जो कर-निर्धारण अधिकारी निर्धारित करेगा देनी होगी।

कर-निर्धारण अधिकारी करदाता द्वारा दिए गए लिखित निवेदन के आधार पर निर्धारित अवधि की समय सीमा को किसी भी समयावधि तक बढ़ा सकता है यदि इसके लिए पर्याप्त कारण हैं लेकिन यह समयावधि किसी भी दशा में उप-धारा (2A) के अन्तर्गत प्राप्त आदेश की तिथि से 180 दिन से अधिक नहीं हो सकती।

2D-उप-धारा (2A) के अन्तर्गत किसी भी अंकेक्षण के लिए व्यय जो अंकेक्षण से सम्बन्धित हैं (एकाउण्टैण्ट के पारिश्रमिक को शामिल करते हुए) का निर्धारण मुख्य कमिश्नर या कमिश्नर द्वारा किया जाएगा जो अन्तिम होगा और उसका भुगतान करदाता द्वारा किया जाएगा। यदि करदाता इसके भुगतान में कोई त्रुटि करता है तो इसका भुगतान करदाता को अध्याय XVII-D (जो बकाए की वसूली से सम्बन्धित है) के अन्तर्गत बताए गए तरीके के अनुसार किया जाएगा।

अतः कर अंकेक्षण की क्या आवश्यकता है? यह कहा जा सकता है कि अंकेक्षित वित्तीय खाते संस्था | के बाहर के लोगों के प्रयोग के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ स्वयं संस्था के लिए भी लाभदायक होते हैं।

यह सत्य है कि आयकर अधिकारियों को देय कर के निर्धारण के लिए इन लेखों पर आश्रित होना पड़ता है लाकनकवल आयकर से सम्बन्धित सूचनाएं प्राप्त करने के लिए वित्तीय लेखों का अंकेक्षण पर्याप्त है। सचनाओ का एकात्रत करने व खातों की शुद्धता एवं वैधता को सत्यापित करने हेतु व करदाता की करयोग्य आय की गणना के लिए अंकेक्षित खातों की पुनः जांच की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

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प्रश्न

1 अनिवार्य कर अंकेक्षण से आप क्या समझते हैं ? सम्बन्धित प्रावधानों की विवेचना कीजिए।

What do you mean by Tax Audit? Explain related provisions

2. कर अंकेक्षक की नियुक्ति पर एक टिप्पणी लिखिए।

Write a note on appointment of Tax Auditor.

3. चार्टर्ड एकाउण्टैण्ट के द्वारा कर अंकेक्षण की संख्या की सीमा के सम्बन्ध में प्रावधानों की व्याख्या कीजिए।

Explain provisions as to ceiling as to number of tax audit by Chartered Accountant.

4. धारा 44AB के अन्तर्गत अंकेक्षित रिपोर्ट के साथ संलग्न की जाने वाली सूचनाओं के सम्बन्ध में फॉर्म 3-CD के प्रावधानों की विवेचना कीजिए।

Explain provisions of Form-3CD given in respect of informations to be annexed with audit report under Section 44AB.

5. सार्वजनिक ट्रस्ट के अंकेक्षण पर एक टिप्पणी लिखिए।

Write a short note on audit of Public Trust.

6. धारा 35D व 35E के अन्तर्गत छूट प्राप्त करने हेतु अनिवार्य कर अंकेक्षण के मुख्य प्रावधानों की व्याख्या कीजिए।

Explain major provisions of compulsory tax audit for claiming deduction under Sections 35D and 35E.

7. आयकर अंकेक्षण की धारा 142 के अन्तर्गत उप-धारा 2A, 2B, 20 व 2D के चयनित कर अंकेक्षण के प्रावधानों को समझाइए।

Explain provisions as to selective tax audit under sub-sections 2A, 2B, 2C and 2D of Section 142 of Income Tax Audit.

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