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BCom 1st Year Time Series Statistics Study Material Notes in Hindi

BCom 1st Year Time Series Statistics Study Material Notes in Hindi

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BCom 1st Year Time Series Statistics Study Material Notes in Hindi
BCom 1st Year Time Series Statistics Study Material Notes in Hindi

BCom 2nd Year Cost Accounting Concepts Classification Study Material

काल श्रेणी का विश्लेषण

(Time Series)

काल श्रेणी का अर्थ

Meaning of Time Series)

आधुनिक आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में समय के साथ-साथ अविराम गति से अनेक परिवर्तन होते

याद भारत में गत दस वर्षों में खाद्यान्न के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाये तो इस निष्कर्ष पर पहँचा जायेगा कि उक्त अवधि में खाद्यान्न के मूल्यों में निरन्तर वृद्धि की प्रवृत्ति रही है परन्तु बीच-बीच में मूल्यों में कमी भी होती रही है। इसके अतिरिक्त एक ही वर्ष में फसल कटाई के समय मूल्य कम हो जाते है तथा बोआई के समय बढ जाते हैं। कभी-कभी अनेक आकस्मिक कारणों (बाढ़, सूखा, युद्ध, बीमारी आदि) से भी मूल्य अनियमित ढंग से परिवर्तित होते रहते हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों का प्रभाव उपभोक्ता, किसान, व्यापारी तथा सरकार सभी पर पड़ता है जिसका अध्ययन सभी के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होता है।

समय के किसी माप (वर्ष, माह, दिन) के आधार पर सम्बद्ध समंकों के व्यवस्थित क्रम को काल श्रेणी (Time Series) तथा समय की गति के साथ-साथ इन मूल्यों में होने वाले उच्चावचनों का विधिवत अध्ययन को काल श्रेणी (Analysis of Time Series) कहते हैं। काल श्रेणी को ऐतिहासिक चर मूल्य (Historical Variables) भी कहते हैं।

काल श्रेणी के अर्थ को स्पष्ट करते हुए प्रो० वर्नर हर्ष ने लिखा है कि-“समय के क्रमिक बिन्दुओं के तत्सम्बन्धित चर मूल्यों के व्यवस्थित क्रम को ही काल श्रेणी कहा जाता है।”

क्राक्सटन एवं काउडेन के अनुसार-“समय के किसी माप के आधार पर प्रस्तुत समंकों का व्यवस्थित क्रम काल श्रेणी कहलाता है।”

केने एवं कीपिंग के अनुसार, “समय पर आधारित समंक समूह को काल श्रेणी कहते हैं।”

इस प्रकार स्पष्ट है कि काल श्रेणी में समय स्वतन्त्र चर (Independent Variable) तथा उससे सम्बद्ध समंक आश्रित चर (Dependent Variable) कहे जाते हैं। समंक समयावधि (Perio of Time) तथा समय बिन्द (Point of Time) से सम्बन्धित हो सकते हैं। प्रति माह कल उत्पादन प्रति वर्ष औसत उत्पादन वर्ष विशेष के बीच औसत मूल्य आदि समयावधि समंक (Period Data) कहलाते हैं। इसी प्रकार मूल्य उद्धरण (Price Quotations),रोगी का प्रति घन्टा तापमान आदि किसी समय बिन्दु से सम्बद्ध समंक (Point Data) कहलाता है । काल श्रेणी के विश्लेषण में इन दोनों प्रकार के समंकों का अध्ययन किया जाता है।

काल श्रेणी का महत्व

(Importance of Time Series)

काल श्रेणी के विश्लेषण का आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में बहुत अधिक महत्व है। काल श्रेणी के विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य भावी घटनाओं का सही अनुमान लगाने के लिए आर्थिक तथ्यों में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी रखना तथा मूल्यांकन करना है। जैसे अर्थशास्त्री को आर्थिक नीतियों के अध्ययन हेतु यह जानना आवश्यक होता है कि भूतकालीन आर्थिक समंकों की क्या प्रवृत्ति रही है तथा भविष्य में प्रवृत्ति क्या होगी? यदि किसी आर्थिक समंक श्रेणी का अध्ययन किया जाये तो समंक मूल्यों में निरन्तर उच्चावचन दिखायी देंगे। परन्तु यदि एक बड़ी काल श्रेणी का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाये तो उच्चावचनों के क्रम में एक प्रकार की संमितता दिखायी देगी। प्रत्येक व्यववसायी, उद्योगपति, प्रबन्धक, कृषि एवं वितीय विशेषज्ञ, तथा सरकार के लिए समय परिवर्तन के साथ-साथ समंकों के मूल्य में परिवर्तन की जो यह प्रवृत्ति दिखायी पडती है, उसकी जानकारी प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि इसी जानकारी के आधार पर वह स्वयं को आकस्मिक एवं अनियमित उच्चावचनों के प्रभाव से बचा सकता है तथा भविष्य के लिए पूर्वानुमान कर सकता है।

काल श्रेणी के विश्लेषण के महत्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है

(i) भूतकालीन परिवर्तनों के कारण तथा परिस्थितियों का अध्ययन करके भावी नीतियों एवं कार्यक्रमों की योजना का निर्धारण किया जा सकता है।

(ii) भूतकालीन प्रवृत्ति विश्लेषण द्वारा भावी प्रवृत्तियों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है।

(iii) व्यापार-चक्रों की प्रवृत्ति तथा कारणों का अध्ययन करके उनके प्रभावों को कम या दूर किया जा

सकता है।

(iv) अन्य काल श्रेणियों से तुल.त्मक सम्बन्ध कायम करना।

इस प्रकार काल श्रेणियों का विश्लेषण उस कम्पास की तरह है जो सामाजिक, आर्थिक, वित्तीय तथा यावसायिक नीतियों के निर्धारण में अर्थशास्त्री व्यवसायी उपभोक्ता.योजना निर्माता तथा सरकार के लिए मार्ग दर्शक का कार्य करता है।

काल श्रेणी के संघटक

(Components of Time Series)

काल श्रेणी के संघटक या अंग से आशय उन परिवर्तनों से है जिनका अध्ययन एवं विश्लेषण काल श्रेणियों के अन्तर्गत किया जाता है। काल श्रेणी के मुख्य संघटक निम्न प्रकार हैं

(1) दीर्घकालीन प्रवृत्ति या उपनति (Long Term or Secular Trend)

(2) अल्पकालीन टच्चावचन (Short-Time Oscillations)

(i) आर्त्तव विचरण या मौसमी उच्चावचन (Seasonal Variations)

(ii) चक्रीय उच्चावचन (Cyclical Fluctuations)।

(3) अनियमित या दैव उच्चावचन (Irregular or Random Fluctuations)।

(1) दीर्घकालीन प्रवृत्ति या उपनति (Long Term or Secular Trend) -किसी भी काल श्रेणी में समय-समय पर उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, परन्तु दीर्घकाल में उस श्रेणी में एक दिशा में बढ़ने या घटने की सामान्य अन्तर्निहित प्रवृत्ति (Underlying Tendency) पायी जाती है। जैसे भारत की जनसंख्या में निरन्तर घट-बढ़ होती दिखायी देती है परन्तु यदि इन अल्पकालीन उच्चावचनों को दूर रखा जाये तो देश की जनसंख्या में मूलतः क्रमिक वृद्धि होती हुई दिखायी देगी। यही अल्पकालीन उच्चावचनों को दूर रखा जाये तो देश की जनसंख्या में मूलतः क्रमिक वृद्धि होती हुई दिखायी देगी। यही दीर्घकालीन प्रवृत्ति कही जाती है। यह प्रवृत्ति हमेशा एक ही दिशा में पायी जाती है चाहे वह वृद्धि की ओर हो या ह्रास की ओर। एक काल श्रेणी में ये दोनों प्रवृत्तियाँ एक साथ प्रगट नहीं हो सकतीं। इसके अतिरिक्त दीर्घकालीन प्रवृत्ति में वृद्धि की कमी एकदम आकस्मिक न होकर धीरे-धीरे क्रमिक गति से होती है । जनसंख्या वृद्धि, उत्पादन प्रणाली में सुधार, पूँजी संख्या व्यावसायिक संगठनों में सुधार, माँग में वृद्धि, सरकारी नियंत्रण आदि कारणों से ही काल श्रेणियों में दीर्घकालीन प्रवृत्ति प्रगट होती है।

(2) अल्पकालीन उच्चावचन (Short-Time Oscillations)-काल श्रेणी में अल्पकाल में नियमितता से अनवतित होकर परिवर्तनों को अल्पकालीन उच्चावचन कहते हैं। ये परिवर्तन दोनों दिशाओं (वृद्धि या कमी) में इन परिवर्तनों की प्रकृति नियमित (Regular) होती है तथा सामयिक परिवर्तनों में एक निश्चित समय के बाद पुनरावृत्ति होती है । एक वर्ष में ही इन परिवर्तनों में नियमितता होने के कारण इनका पूर्वानुमान आसानी से किया जा सकता है । अल्पकालीन उच्चावचन निम्न दो प्रकार के होते हैं

(i) आर्तव या मौसमी उच्चावचन (Seasonal Variations)-आर्तव या मौसमी विचरण काल श्रेणी में ऐसे तथ्य व प्रभाव होते हैं जो जलवायु या रीति-रिवाज के कारण होते हैं। ये विचरण परिणाम में नियमित तथा एकरूपता से घटते-बढ़ते हैं तथा प्रति घन्टा, प्रतिदिन या प्रतिमाह हो सकते हैं। वस्तुओं के मूल्य,उनका उत्पादन उपभोग तथा ब्याज दर आदि सभी आर्तव विचरण को प्रगट करते हैं। ऐसे विचरण मौसम विशेष से सम्बन्धित तथा नियमित होने के कारण इनका पूर्वानुमान करना सम्भव होता है। जैसे-सर्दी के मौसम में ऊनी कपड़ों के मूल्य बढ़ जाते हैं तथा गर्मी में इन कपड़ों के मूल्य घटने लगते हैं, इसी प्रकार गर्मी में बिजली के पंखों तथा कूलर के मूल्य बढ़ जाते हैं तथा सर्दी के मौसम में उनके मूल्य कम हो जाते हैं। मौसम के अतिरिक्त भार भी अन्य कारण हैं जिनसे आर्त्तव विचरण प्रभावित होते हैं; जैसे-रीति-रिवाज, त्योहार, शादी-विवाह आदि।

अतः आत्तव विचरण एक वर्ष के विभिन्न महीनों तथा सप्ताहों में दिखायी देते हैं जो प्रतिवर्ष उसी प्रकार नियमित रूप से आते हैं।

(ii) चक्रीय उच्चावचन (Cyclical Fluctuations)-आर्थिक क्रियाओं में होने वाले क्रमिक उतार-चढ़ाव चक्रीय उच्चावचन कहलाते हैं। चक्रीय उच्चावचन भी नियमित होते हैं परन्तु अवधि एक वर्ष से आधक होती है। ऐसे उच्चावचन व्यापार चक्रों (Trade Cycle) से उत्पन्न होते हैं। व्यापार चक्र आर्थिक क्रियाओं में महत्त्वपूर्ण होते हैं तथा वे मूल्य,उत्पादन तथा मजदूरी आदि को प्रभावित करते हैं । चक्रीय उच्चावचन की क्रमशः चार अवस्थाएँ होती हैं-(i) समृद्धि या तेजी काल (Prosperity of Boom), (ii) अवरोध (Recession), (iii) मन्दी या अवसाद (Depression) तथा (iv) पुनरुत्थान (Recovery) | व्यापार चक्रों की समयावधि उतनी नियमित नहीं होती है जितनी मौसमी विचरण की होती है। यही कारण है कि उनसे होने वाले प्रभावों को सामयिक उच्चावचन न कह कर चक्रीय उच्चावचन कहते हैं।

(3) अनियमित या देव उच्चावचन (Irregular or Random Fluctuations)-जब आकास्मक कारणों से कभी-कभी काल श्रेणी में परिवर्तन होते हैं तो उन्हें अनियमित या दैव वश उच्चावचन कहते हैं । ऐसे उच्चावचनों की पहले से कोई जानकारी नहीं होती है इसलिए इनका पूर्वानुमान करना कठिन होता है। अनियमित या दैव उच्चावचन निम्न दो प्रकार के हो सकते हैं

(i) घटनात्मक परिवर्तन (Episodic Movement)-घटनात्मक परिवर्तन किसी आकस्मिक घटना के कारण उत्पन्न होते हैं; जैसे-युद्ध, बाढ़, सूखा, भूकम्प, हड़ताल तथा राजनीतिक अस्थिरता आदि।

(ii) संयोगिक परिवर्तन (Accidental Movement)-संयोगिक परिवर्तन दैव योग (Random) प्रकृति के होते हैं।

काल श्रेणी का विश्लेषण

(Analysis of Time Series)

काल श्रेणी के संघटक या अंगों का अध्ययन ही काल श्रेणी का विश्लेषण कहलाता है। यह स्पष्ट हो चुका है कि काल श्रेणी के मूल समंक (Original Data or 0), प्रवृत्ति मूल्य (Trend Value or T), अल्पकालीन परिवर्तन अर्थात् मौसमी विचरण (Seasonal Variations or C) तथा चक्रीय उच्चावचन (Cyclical Fluctuations or C) और अनियमित उच्चावचन (Irregular Fluctutions or I) द्वारा सामूहिक रूप से प्रमाणित होते हैं अतः काल श्रेणी इन चार संघटकों का मिश्रण है। काल श्रेणी के इन चार संघटकों को अलग-अलग करके उनका अध्ययन करना ही काल श्रेणी का विश्लेषण कहलाता है। काल श्रेणी के इन चार संघटकों की विश्लेषणात्मक गणना निम्न दो निदर्शो (Models) के आधार पर की जा सकती है।

1 योगात्मक निदर्श (Additive Model)-इस निदर्श की आधारभूत मान्यता यह है कि मूल समंक (O) चार संघटकों का योग होता है, अर्थात्

0 = T+S+C+1

इस मान्यता के आधार पर काल श्रेणी के मूल समंक में से दीर्घकालीन प्रवृत्ति (T) को घटाकर (0-T) अल्पकालीन उच्चावचनों (S + C + 1) का पृथक्कीकरण किया जा सकता है।

0-T=S+C+I

इन अल्पकालीन उच्चावचनों में से मौसमी विचरण (S) को घटा कर चक्रीय उच्चावचन तथा अनियमित उच्चावचनों (C+n का अनमान लगाया जा सकता है।

0-T-S = C+I

इसी प्रकार अल्पकालीन उच्चावचनों में से मौसमी (S) तथा चक्रीय (C) उच्चावचनों को घटाकर अनियमित परिवर्तन (1) ज्ञात किया जा सकता है।

(0-T)-(S+C) =1

2. गुणात्मक निदर्श (Multiplicative Model)-इसकी मान्यता यह है कि काल श्रेणी में मूल समंक | (O) चार संघटकों का गुणनफल होता है, अर्थात् ।

0 = TxsxcxI

इस मान्यता के अनुसार अल्पकालीन उच्चावचन की गणना निम्न प्रकार होगीअल्पकालीन उच्चावचन =O/T = SxcxI चक्रीय एवं अनियमित उच्चावचन = =CxI अनियमित उच्चावचन =सास०

Txsxc इस प्रकार उपरोक्त निदर्शो (Models) में से किसी एक के द्वारा काल श्रेणी के संघटकों को अलग-अलग किया जा सकता है। काल श्रेणी में परिवर्तन अनेक शक्तियों के कारण होते हैं जिन पर विश्लेषणकर्ता का नियन्त्रण नहीं होता है तथा यही कारण है कि वह भौतिक विज्ञान की प्रयोग विधि को अपना कर विश्लेषण नहीं कर सकता है। उसे सभी शक्तियों में से एक को छोड़ कर अन्य को स्थिर मानना पड़ता है। अन्य को स्थिर की मान्यता के कारण ही काल श्रेणी के विश्लेषण की विधि शुद्ध नहीं मानी जाती है, फिर भी आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में इसका विशेष महत्व है।

दीर्घकालीन प्रवृत्ति की माप

(Measurement of Secular Trend)

दीर्घकालीन प्रवृत्ति का अध्ययन तभी किया जा सकता है जब काल श्रेणी में उसको प्रभावित करने वाले अल्पकालीन उच्चावचनों को दूर कर दिया जाये। दीर्घकालीन प्रवृत्ति की माप करने की निम्न विधियाँ हैं

(1) स्वतन्त्र हस्त वक्र विधि (Freehand Curve Method)

(2) अर्धमध्यक विधि (Semi-Average Method)

(3) चल माध्य विधि (Moving Average Method)

(4) न्यूनतम वर्ग विधि (Least Square Method)

1 स्वतन्त्र हस्त वक्र विधि (Freehand Curve Method)-दीर्घकालीन प्रवृत्ति ज्ञात करने की यह सबसे आसान विधि है। इसके अनुसार सर्वप्रथ्म काल श्रेणी को ग्राफ पर प्रांकित कर लिया जाता है, फिर रेखाचित्र के उच्चावचनों को ध्यान में रखते हुए उनके विभिन्न बिन्दुओं के मध्य से होकर जाती हुई एक सरल रेखा (Straight Line) या एक सरलित वक्र (Smoothed Curve) बना दिया जाता है। यही रेखा या वक्र दीर्घकालीन प्रवृत्ति को प्रदर्शित करते हैं। इस विधि में बिन्दुओं के सरलीकरण का कोई स्पष्ट आधार न होने के कारण वक्र का कोई निश्चित स्वरूप नहीं आंका जा सकता है

Illustration 1

निम्न समंकों के लिये मुक्त हस्त वक्र विधि से दीर्घकालीन प्रवृत्ति ज्ञात कीजिये

Find out the ‘Secular Trend’ of the following data by Freehand Curve Method.

Year 1985 1986 1987 1988 1989 1990
Production ( in Lakh tons ) 15 23 19 27 24 30

Solution :-Graph showing Secular Trend by Freehand Curve Method.

Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study

2. अर्धमध्यक विधि (Semi-Average Method) दीर्घकालीन प्रवृत्ति ज्ञात करने की अर्धमाध्य विधि म मालिक समंकों को दो भागों में बाँटा जाता है। दोनों विभागों के पदों का अलग-अलग योग करके उनका समान्तर माध्य ज्ञात किया जाता है। मल समंकों को जिस ग्राफ पर प्रांकित किया गया है उसी ग्राफ पर उन दाना माध्यों को भी प्रांकित करके एक सीधी रेखा से मिला देना चाहिए। यह सीधी रेखा ही दीर्घकालीन प्रवत्ति को प्रदर्शित करेगी। यदि वर्षों की संख्या विषम हो तो मध्य वाले वर्ष को छोड़ कर श्रेणी को दो भागों में बाँटा जाता है । यह विधि स्वतन्त्र हस्तवक्र विधि से अधिक उपयुक्त विधि है। Illustration 2 – . निम्न आंकड़ों से अर्द्ध-मध्यक रीति का प्रयोग करते हुए दीर्घकालीन प्रवृत्ति निर्धारित कीजिए तथा 1997 के मूल्य का अनुमान कीजिए

Determine trend of the following data by applying the method of semi average and estimate the value for 1997:

Year 1990 1991 1992 1993 1994 1995
Sales 50 58 54 70 66 74

Solution :-दिये गये छः वर्षों के मूल्यों में से 3-3 वर्षों के दो बराबर भाग होंगे और उनके माध्य ज्ञात किये जायेंगे।

Time Series Statistics Study
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Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
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3. चल माध्य रीति (Method of Moving Average)-दीर्घकालीन प्रवृत्ति ज्ञात करते समय अधिकांशतः चल माध्य रीति का प्रयोग ही उपयुक्त माना जाता है। इस रीति के अन्तर्गत सबसे पहले हमें देखना होगा कि चल माध्य कितने वर्षीय है? अवधि विषम (odd) 3, 5, 7, 9, 11 और सम (even) 4, 6,8, 10, 12 वर्षीय भी हो सकती है। चल माध्य की अवधि क्या हो, यह मूल्यों में उतार-चढ़ाव व पदों की संख्या पर निर्भर करता है।

यदि चल माध्य की अवधि विषम है, माना 7 वर्ष है तब चल माध्य की गणना निम्न प्रकार होगी

(i) काल श्रेणी के प्रथम सात मूल्यों को जोड़कर प्राप्त योग को चतुर्थ वर्ष अर्थात् यह एक वर्ष के सामने रखेंगे।

(ii) तत्पश्चात् पहले वर्ष के मूल्य को छोड़कर तथा आठवें वर्ष के मूल्य को जोड़कर पाँचवें वर्ष के सामने रखेंगे तथा अन्तिम पद के आने तक यह क्रिया निरन्तर चलती रहेगी।

(iii) अब हम प्राप्त किये चल माध्य योगों को चल माध्य की अवधि जो कि हमने 7 वर्ष मानी है उर भाग दे देंगे। भाग देने पर जो मूल्य प्राप्त होगा वही चल माध्य है।

(iv) तीन वर्षीय चल माध्य में पहला व अन्तिम पद, पाँच वर्षीय चल माध्य में प्रथम दो व अन्तिम दोनों पद, सात वर्षीय चल माध्य में प्रथम तीन व अन्तिम पद,नौ वर्षीय चल माध्य में प्रथम चार व अन्तिम चार पद रिक्त रहेंगे।

Illustration 5

निम्न समंकों से 3 वर्षीय चल माध्य द्वारा दीर्घकालीन प्रवृत्ति ज्ञात कीजिये तथा उन्हें ग्राफ पर प्रदर्शित कीजिये

Find the secular trend by 3 Yearly moving average of the following data an plot them on graph Paper :

Year 1988 89 90 91 92 93
Sales ( in Lakh rs ) 45 40 48 62 54 75

 (i) यदि चार वर्षीय चल माध्य की गणना करनी है तब हम सर्वप्रथम चार वर्षों का जोड़ करके प्राप्त जोड़ को दूसरे व तीसरे वर्ष के बीच में रख देंगे फिर अगले जोड (दसरे से पाँचवें वर्ष तक) को तीसरे व चौथे वर्ष के बीच में रखेंगे। इस प्रकार यही क्रिया अन्त तक चलेगी।

(ii) तत्पश्चात् पहले व दूसरे चार वर्षीय जोडों को जोड़कर तीसरे वर्ष के सामने तथा दूसरे व तीसरे चार वर्षीय जोड़ों के जोड़ को चौथे वर्ष के सामने और आगे भी यही प्रक्रिया निरन्तर अन्तिम पद तक चलती रहेगी।

(iii) इस प्रकार से प्राप्त आठ वर्षीय जोड़ों को चल माध्य की अवधि के दो गुने अर्थात् 8 से क्रमशः भाग करके वर्षीय चल माध्य निकाले जायेंगे।

Illustration 8 –

निम्न समंकों के लिए चार वर्षीय चल माध्यों की विधि द्वारा उपनति मूल्य ज्ञात कीजिए

From the following data calculate the trend values according to four-years moving average.

Year 1979 1980 1981 1982 1983 1984
Value 506 620 1036 673 588 696

चल माध्य की गणना में भारों का प्रयोग (Use of weight is the calculation of Moving Average) चल माध्य की गणना में भारों का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसका उद्देश्य विभिन्न वर्षों के मूल्यों को विभिन्न महत्त्व प्रदान करता है । इसे निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है

निघातीय वक्र का लघुगणकीय समीकरण (Logarthims Equations of Second Degree Curves)- जब कभा समका का अध लघगणकीय ग्राफ पर प्रांकित करने पर लगातार घमाव बना रह अथात परिवर्तन का अनुपात बढ़ता या घटता हुआ प्रतीत हो तो द्वि-घातीय वक्र का लघुगणकीय समीकरण निम्न प्रकार बनाया जाता है

logy’ = loga+x log b =x-logc

न्यनतम वर्ग विधि का विशेषताएं (Properties of Least Saware Method)-एक गाणतायावाष होने के कारण न्यूनतम वर्ग विधि दीर्घकालीन, प्रवृत्ति की माप करने की एक सर्वश्रेष्ठ विधि मानी जाती है । इससे प्राप्त प्रवृत्ति मूल्य वास्तविकता के निकट होते हैं। इसके द्वारा प्राप्त प्रवृत्ति रेखा सर्वोपयुक्त रेखा (Line of best fit) मानी जाती है क्योंकि यह वह रेखा होती है, जिससे धनात्मक तथा ऋणात्मक विचलनों का योग शून्य होता है तथा विचलनों के वर्गों का योग (Y- Y) न्यूनतम होता है। इससे भविष्य के लिए पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। परन्तु ये पूर्वानुमान तभी उपयुक्त हो सकते हैं जब प्रवृत्ति से काल श्रेणी के मूल समंकों तथा समयावधि के बीच फलनात्मक (Functional) सम्बन्ध हो, अन्यथा प्रवृत्ति भ्रामक हो सकती है।

अल्पकालीन उच्चावचनो की माप

(Measures of Short-Time Oscillations)

काल श्रेणियों के विश्लेषण की योगात्मक (Additive) तथा गुणात्मक (Multiplicative) निदर्शों के अनुसार किसी माप श्रेणी के मूल समंक (O) में से उसकी दीर्घकालीन प्रवृत्ति को अलग कर दिया जाये तो शेष अल्पकालीन उच्चावचन रह जाते हैं। ये अल्पकालीन उच्चावचन निम्न तीन प्रकार के होते हैं

(1) आर्तव या मौसमी विचरण (Seasonal Variations)

(2) चक्रीय उच्चावचन (Cyclical Fluctuations)

(3) अनियमित या दैव उच्चावचन (Irregular or Random Fluctuations)

आर्तव या मौसमी विचरण की माप (Measurement of Seasonal Variations)- आर्थिक एवं व्यावसायिक क्षेत्रों में अधिकांश तत्व भौसमी प्रकृति के होते हैं। इन मौसमी विचरणों का सांख्यिकीय विश्लेषण करने के पूर्व इन्हें दीर्घकालीन प्रवृत्ति, चक्रीय एवं अनियमित विचरणों के प्रभाव से मुक्त करना आवश्यक होता है । जब एक बार ये तीनों संघटक अलग कर दिये जाते हैं तो मौसमी विचरणों के निर्देशांक आसानी से तैयार किये जा सकते हैं। काल श्रेणियो के विश्लेषण में आर्तव या मौसमी विचरणों की माप करना अत्यन्त आवश्यक है। आर्त्तव विचरण ज्ञात करने विभिन्न विधियाँ निम्न प्रकार हैं

1 आर्त्तव विचरण निर्देशांक विधि (Seasonal Variation Index Nos. Method)-आर्त्तव विचरण ज्ञात करने की यह सबसे सरल विधि है। इसका प्रयोग प्रायः बारह मासिक समंकों की ऋतुनिष्ठता की माप करने के लिए किया जाता है। इस विधि की गणना क्रिया निम्न प्रकार है

(i) सर्वप्रथम समान महीनों या त्रैमासिक (Quarters) अवधियों के मूल्यों को जोड़कर तथा उनमें वर्षों का संख्या से भाग देकर आर्त्तव माध्य (Seasonal Average) ज्ञात किया जाता है।

(ii) बारह महीनों के आर्तव माध्यों को जोड़कर उनमें 12 से भाग देकर सामान्य माध्य (General Average) ज्ञात किया जाता है।

(iii) सामान्य माध्य को आधार = 100 मानकर प्रत्येक आर्तव माध्य का निर्देशांक निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है:

Seasonal Variation Index Nos. = General Average Seasonal

Illustration 21

एक कम्पनी की बिक्री जनवरी माह में 30,000 रु. से बढ़कर फरवरी माह में 35,000 रु० हो गयी। इन दो माहों का आर्त्तव निर्देशांक क्रमश: 105 और 140 था। कम्पनी का स्वामी फरवरी माह में बिक्री में। 5,000 रु० की वृद्धि से किसी तरह सन्तष्ट नहीं है। उसे उस माह के आर्त्तव निर्देशांक के कारण और अधिक आशा थी। फरवरी माह के लिए बिक्री का उसका अनुमान क्या था?

The sale of a company rose from Rs. 30,000 in the month of January to Rs. 35,000 in the month of February. The seasonal index for these two months are 105 and 140 respectively. The owner of the company was not at all statisfied with the rise of sale of the month of February by Rs. 5,000. He expected much more because of the seasonal index for that month. What was his estimate of sale for the month of February?

Solution :

जनवरी माह में 105 निर्देशांक के लिए बिक्री की राशि 30,000 रु० थी। अत: फरवरी माह में 140 निर्देशांक के आधार पर बिक्री की राशि

30,000X 140

0 = 40,000 रु. होनी चाहिए, लेकिन यह 35,000

105 रु. ही हुई है। अत: कम्पनी स्वामी का सन्तुष्ट न होना पूर्णतः उचित है।

2. चल माध्य द्वारा आर्त्तव विचरण (Seasonal Variation through Moving Average) चल माध्य द्वारा आर्त्तव विचरण ज्ञात करने की यह विधि, आर्त्तव विचरण निर्देशांक विधि से श्रेष्ठ मानी जाती है। क्योंकि इसके द्वारा चक्रीय उच्चावचनों को छोड़ कर शेष सभी प्रकार के विचलनों; जैसे प्रवृत्ति (Trend), अल्पकालीन परिवर्तन, मौसमी परिवर्तन तथा अनियमित या दैव उच्चावचन आदि का विश्लेषण किया जाता है। इस विधि में निम्न गणना क्रियाएँ करनी पड़ती है

(i) सर्वप्रथम मूल्य के बारह मासिक या त्रैमासिक (Quarterly) चल माध्य ज्ञात किया जाता है। यदि समयावधि सम (Even) है तो चल माध्यो को केन्द्रित करना आवश्यक होता है। चंल माध्य प्रवृत्ति मूल्य कहे जाते हैं।

(ii) काल श्रेणी के प्रत्येक मूल समंक (0) में से चल माध्य (T) घटा कर अलाकालीन विचलन (0-7) ज्ञात किया जाता है।

(iii) अल्पकालीन विलचनों के योग में विचलनों की संख्या से भाग देकर मौसमी या आर्त्तव विचलन (S) ज्ञात किया जाता है।

(iv) प्रत्येक मौसम के अल्पकालीन विचलन में से आर्तव विचलन (S) को घटाकर अनियमित विचलन (Irregular Fluctuation) ज्ञात किया जाता है।

Illustration 22

निम्न समंकों से चल माध्य रीति द्वारा मौसमी विचरण ज्ञात कीजिये

From the following data find seasonal variation through. moving average method.

Year Summer Monsoon Autumn Winter
1980 30 81 62 119
1981 30 104 86 171
1982 42 153 99 221
1983 56 172 129 235
1984 67 201 136 302
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
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चक्रीय उच्चावचनों की माप

(Measurement of Cyclical Fluctuations)

काल श्रेणी का विश्लेषण दो प्रकार के निदर्शों (Models) योगात्मक निदर्श तथा गुणात्मक निदर्श के । आधार पर किया जाता है।

(i) योगात्मक निदर्श (Additive Model)-यह निदर्श इस मान्यता पर आधारित है कि काल श्रेणी के मूल समंक चारों संघटको का योग है अर्थात्

O = TXS X CXI जहाँ,

(O) = मूल समंक (Original data)

(T) = प्रवृत्ति मूल्य (Trend value) =

(S )आर्त्तव विचरण (Seasonal Variations)

(C) = चक्रीय उच्चावचन (Cyclical Fluctuations)

(I) = अनियमित उच्चावचन (Irregular Fluctuations)

(ii) गुणात्मक निदर्श (Multiplicative Model)—यह निदर्श इस मान्यता पर आधारित है कि काल श्रेणी के मूल समंक चारों संघटकों का गुणनफल है।

O = TXS XCXI

काल श्रेणी में चक्रीय उच्चावचन भी होते हैं लेकिन इनका माप करना बहुत कठिन है। क्राक्सन (Croxton) ने चक्रीय उच्चावचनों के माप की निम्न विधियाँ बतायी हैं

(i) अवशेष विधि (Residual Method)

(ii) प्रत्यक्ष विधि (Direct Method)

(iii) हरात्मक माध्य विधि (Harmonic Average Method)

(iv) चक्रीय माध्य विधि (Cyclical Average Method)

इन सब में अवशेष विधि सर्वोत्तम है। इस विधि के अनुसार मूल समंकों में दीर्घकालीन प्रवृत्ति तथा गौसमी विचरण के निर्देशांकों के गुणनफल से भाग दिया जाये तो चक्रीय उच्चावचन प्राप्त होंगे।

Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study
Time Series Statistics Study

सैद्धान्तिक प्रश्न

(Theoretical Problems)

1 काल श्रेणी के विश्लेषण से क्या आशय है ? उसके कौन-कौन से प्रमुख संघटक हैं? मौसमी उच्चावचनों ‘को मापने की विधियों को बताइए।

What do you mean by analysis of time series ” What are its main components?Explain the methods of the measurement of seasonal variations.

2. काल श्रेणियों के विश्लेषण में आप कौन-सी सांख्यकीय पद्धति अपनायेंगे तथा दीर्घकालीन प्रवृत्ति को कैसे अलग करेंगे?

Describe the statistical method you would adopt in the anaylsis of ‘Time Series’ and explain how would you isolate the secular trend?

3. दीर्घकालीन प्रवृत्ति’ किसे कहते हैं ? इसके मापने की विभिन्न विधियो को बताइए।

What do you mean by ‘Secular Trend’ ? Describe the various methods of the measurement of secular trend.

4. काल श्रेणी क्या है ? दीर्घकालीन प्रवृत्ति, आर्त्तव विचरण तथा चक्रीय परिवर्तनो में अन्तर बताइए किसी श्रेणी में दीर्घ कालीन प्रवृत्ति कैसे मापी जाती हैं?

What is time series? Differentiate between secular trend, seasonal variation and cyclical fluctuations. How would you measure secular trend in any given data?

5. काल श्रेणियों के विश्लेषण की उपयोगिता बताइए तथा इनके अध्ययन की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।

Show the utility of the analysis of time series and explain the various methods of its study.

6. काल श्रेणी का विश्लेषण करने में चल माध्यों के महत्व एवं सीमाओं को बताइए।

State the significance of moving aver age in analysing the time series and point out their limitations.

7. एक काल श्रेणी के मौसमी विचरण का क्या आशय है ? मौसमी विचरण की माप करने की विभिन्न विधियों को स्पष्ट कीजिए।

What is seasonal variation of a time series. Describe the different methods of measuring seasonal variation.

8. निम्न पर टिप्पणी लिखिए।

Write short-notes on the following :

(i) काल श्रेणी तथा वक्र आसंजन (Time series and curve fiting)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

(Very Short Answered Questions)

(अ) निम्न कथनों में कौन-सा कथन सत्य या असत्य है :

State the following statements are TRUE or FALSE:

(i) एक समंकमाला आर्थिक और अनार्थिक दोनों घटकों से प्रभावित होती है।

A series of data is effected by both economic and non-economic factors.

(ii) मुक्त हस्त वक्र विधि में वक्र वास्तविक मूल्य आधार पर खींचा जाता है।

Under free hand curve method, curve is drawn on base of actual values.

(iii) न्यूनतम वर्ग रीति द्वारा ज्ञात दीर्घकालीन प्रवृत्ति का वक्र एक सरल रेखा द्वारा प्रदर्शित होता है।

The curve of secular trend determined by least square method is represented by straight line.

(iv) चल माध्य रीति के अन्तर्गत केवल विषम अवधि (Odd Period) का प्रयोग किया जाता है।

Under moving average method only odd period is used.

(v) चल माध्य रीति दीर्घकालीन प्रवृत्ति को ज्ञात करने की एक लोचपूर्ण रीति है।

Moving average is flexible method to calculate secular trend.

(vi) अर्द्ध मध्यक विरि में काल श्रेणी के मूल्यों को तीन बराबर भागों में बाँटा जाता है।

Under semi-average method the series is divided into three parts.

(i) सत्य, (ii) असत्य, (ii) सत्य, (iv) असत्य, (v) सत्य, (vi) असत्य]

(ब) रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये

Fill in the blanks:

(i) किसी काल श्रेणी के समंकों में घटने या बढ़ने की प्रवृत्ति को ………….. कहते हैं।

The tendency of data to increase or decrease in a time series is called

(ii) काल श्रेणी के समंक ………. प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं यदि वृद्धि दर स्थिर होती है।

The data of time series depicts ……… tendency if increase rate is stable.

(iii) न्यूनतम वर्ग रीति में वास्तविक मूल्यों और प्रवृत्ति मूल्यों का योग ……….. होता है।

In Least Square Method, the sum total of actual values and trend values is ………..

(iv) दीर्घ कालीन प्रवृत्ति ज्ञात करने की अर्द्ध माध्य रीति में मौलिक समंकों को ………… भागों में बाँटा जाता है।

To measure long term or secular trend by Semi-average method the data is divided into ……….. parts.

(v) न्यूनतम वर्ग रीति द्वारा प्रवृत्ति मूल्य ज्ञात करने के लिये आधारभूत समीकरण …………. है ।

Under Least Square method the basic equation to determine trend values is ………

(vi )  एक वर्ष से अधिक की अवधि में होने वाले नियमित परिवर्तनों को ……. उच्चावचन कहते हैं।

The regular changes occuring in more than period of one year is called ….. fluctuations.

(i) सुदीर्घकालीन उपनति,(ii) रेखीय,(iii) बराबर (iv) दा.

(v) y=a + bx, (vi) चक्रीय]

 

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