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BCom 1st Year Economics Short run Long run Cost Curves Study Material Notes in Hindi

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BCom 1st year Business Economics Cost Concepts Study Material Notes in Hindi

अल्पकालीन और दीर्घकालीन लागत वक्र

(Short-run and Long-run Cost Curves)

लागतों के व्यवहार का अध्ययन और उनका रेखाचित्रीय प्रदर्शन एक अति महत्वपूर्ण विषय है। यह प्रबन्ध के उत्पाद सम्बन्धी निर्णयों का लागतों पर प्रभाव के आकलन में सहायक होता है। इसके अन्तर्गत विविध प्रकार की लागतों का उत्पादन-मात्रा के साथ सम्बन्ध की व्याख्य जाती है। लागत और उत्पादन के सम्बन्ध का आशय उत्पादन-मात्रा के परिवर्तन पर लागत में परिवर्तन की स्थिति के अध्ययन से होता है। यह अध्ययन प्रबन्ध को इष्टतम उत्पादन स्तर के निर्धारण तथा अनेक प्रबन्धकीय समस्याओं के हल करने में पर्याप्त सहायक होता है। अध्ययन की दृष्टि से लागत के सिद्धान्तों को परम्परावादी और आधुनिक दो भागों में बाँटा जाता है। इन दोनों सिद्धान्तों में अन्तर लागत-वकों के स्वरूप व आकार को लेकर है।

लागतों का परम्परागत सिद्धान्त

(Traditional Theory of Costs)

लागत-मात्रा सम्बन्ध पर विचार ‘अल्पकाल’ तथा ‘दीर्घकाल’ दो दृष्टिकोण से किया जाता हैंं ।

अल्पकाल में लागत-उत्पादन मात्रा सम्बन्ध अथवा औसत लागतों का व्यवहार

(Cost-Output Relationship or Behaviour of Average Costs in the Short-run)

अल्पकाल का आशय उस अवधि से होता है जिसमें फर्म के स्थिर उपकरणों और उसके व्यवसाय के आकार (अर्थात् उत्पादन क्षमता) में परिवर्तन सम्भव नहीं होता है। अतः इस कात में उत्पादन-मात्रा में परिवर्तन उत्पादन के वर्तमान स्थिर उपकरणों की अप्रयुक्त क्षमता तक ही सम्भव होता है। इस काल में कुछ आदान कारक (input factors) स्थिर होते हैं और कुछ परिवर्तनशील। उत्पादन-मात्रा के परिवर्तन पर विभिन्न अल्पकालीन लागतों के व्यवहार को स्पष्ट करने के लिये निम्नलिखित काल्पनिक सारणी की सहायता ली गई है :

Short run Long run Cost
Short run Long run Cost

अल्पकाल में लागतों के व्यवहार का अध्ययन दो प्रकार से किया जाता है :

(i) अल्पकालीन कुल लागतें

(ii) अल्पकालीन औसत या इकाई लागतें।

अल्पकालीन कुल लागतें (Short-run Total Costs)

एक फर्म में अल्पकालीन कल लागतें निम्न प्रकार की होती हैं:

कुल स्थिर लागतें (Total Fixed Costs): अल्पकाल में कुल स्थिर लागतें उत्पादन के शून्य स्तर से लेकर अधिकतम सम्भव स्तर तक एक समान या स्थिर रहती हैं। (पृष्ठ B103 पर दी गई तालिका में कालम 2 को देखिये) इन लागतों का उत्पादन की मात्रा से कोई सम्बन्ध नहीं होता वरन इनका सम्बन्ध फर्म के उद्योग में बने रहने या समयावधि से होता है। फर्म के अल्पकाल के लिये बन्द कर देने पर भी ये लागतें बनी रहती हैं। अल्पकालीन कले स्थिर लागत रेखा X-अक्ष के समानान्तर एक पड़ी रेखा होती है। (चित्र सं० 6.1 में देखिये)

कुल परिवर्तनशील लागतें (Total Variable Costs) : अल्पकाल में कुल परिवर्तनशील लागतों का उत्पादन की मात्रा से प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। उत्पादन के बन्द कर देने पर ये लागतें नहीं रहती हैं। दूसरे शब्दों में, कल परिवर्तनशील लागते शुन्य उत्पादन पर शून्य होती हैं तथा उत्पादन की मात्रा के बढ़ने पर बढ़ती हैं तथा घटने पर घटती हैं। उत्पादन बढ़ाने पर प्रारम्भ में उत्पत्ति वृद्धि नियम की क्रियाशीलता के कारण कुल परिवर्तनशील लागतें घटती दर से बढ़ती हैं, फिर उत्पत्ति समता नियम की क्रियाशीलता के कारण समान दर से तथा अन्त में उत्पत्ति हास नियम की क्रियाशीलता के कारण बढ़ती दर से बढ़ती हैं। कुल परिवर्तनशील लागतों का यह व्यवहार पृष्ठ B 103 पर दी तालिका के कालम 3 में देखा जा सकता हैं। ये शून्य उत्पादन स्तर पर शून्य हैं तथा उत्पादन-मात्रा के बढ़ने पर बढती जाती हैं। परिवर्तनशील अनुपातों के नियम की क्रियाशीलता के कारण ही अल्पकाल में कुल परिवर्तनशील लागत एक सरल रेखा न होकर एक वक्र होता है जो प्रारम्भ में घटती दर से, फिर स्थिर दर से और अन्त में बढ़ती दर से उत्पादन की मात्रा बढ़ता है। चित्र 6.1 में कुल परिवर्तनशील लागत वक्र को दर्शाया गया है।

कुल लागतें (Total Costs) : किसी संस्था में उत्पादित वस्तुओं की कुल संख्या पर जो लागत आती है, उसे कुल लागत कहते हैं। प्रो० दूली के शब्दों में, “किसी वस्तु की एक निश्चित मात्रा को उत्पन्न करने में किये जाने वाले सभी खर्चों के योग को कुल लागत कहते हैं।” यह कुल स्थिर लागतों और कुल परिवर्तनशील लागतों का योग होती हैं। शून्य उत्पादन की स्थिति में कुल लागत और कुल स्थिर लागत बराबर होती हैं तथा उसके पश्चात् अल्पकाल में कुल लागतें कुल परिवर्तनशील लागतों का योग होती हैं। शून्य उत्पादन की स्थिति में कुल लागतों का योग स्थिर लागत बराबर होती हैं तथा इसके पश्चात् अल्पकाल में कुल लागतें कुल परिवर्तनशील लागतों के अनुसार परिवर्तित होती हैं। अल्पकाल में कुल लागत वक्र और कुल परिवर्तनशील लागत वक्र उत्पादन के प्रत्येक बिन्दु पर एक दूसरे के समानान्तर रहते हैं तथा इन दोनों वक्रों के बीच की दूरी कुल स्थिर लागत के बराबर होती है।

अल्पकालीन और दीर्घकालीन लागत वक्र

अल्पकालीन औसत लागतें (Short-run Average Costs)

इस काल में लागत-उत्पादन मात्रा के सम्बन्धों का अध्ययन औसत स्थिर लागत, औसत परिवर्तनशील लागत और औसत कुल लागत के सन्दर्भ में किया जाता है।

औसत स्थिर लागत और उत्पादन-मात्रा (Average Fixed Cost and Output) : औसत स्थिर लागत ज्ञात करने के लिये कुल स्थिर लागतों में उत्पादन-मात्रा का भाग दिया जाता है। अल्पकाल में कुल स्थिर लागत तो स्थिर रहती है किन्तु औसत स्थिर लागत उत्पादन की मात्रा की प्रत्येक वृद्धि के साथ घटती जाती है तथा उत्पादन मात्रा में गिरावट के साथ बरती जाती है। संक्षेप में, औसत स्थिर लागत और उत्पादन-मात्रा के बीच विपरीत सम्बन्ध पाया जाता है तथा यह सभी प्रकार के व्यवसायों में समान रूप से लागू होता है। औसत स्थिर लागत वक्र सदैव बायें से दायें नीचे की ओर झुका हुआ रहता है।

औसत परिवर्तनशील लागत और उत्पादन मात्रा (Average Variable Cost and Output) : कुल परिवर्तनशील लागत में सम्बन्धित उत्पादन-मात्रा का भागफल औसत परिवर्तनशील लागत कहलाता है। उत्पादन में वृद्धि होने पर प्रारम्भ में औसत परिवर्तनशील लागत घटती है और फिर एक सीमा (आदर्श उत्पादन क्षमता) के पश्चात यह बढ़ने लगती है। इसका कारण यह है कि एक स्थिर संयंत्र पर जब परिवर्तनशील कारकों की अधिकाधिक इकाइयाँ लगाते जाते हैं तो प्रारम्भ में स्थिर साधनों की उत्पादन-शक्ति का अधिक अच्छी तरह से प्रयोग होने के कारण आदान कारकों (Input Factors) की कुशलता बढ़ती है जिसके फलस्वरूप औसत परिवर्तनशील लागत घटती है किन्तु संयंत्र की आदर्श उत्पादन क्षमता के पश्चात् विभिन्न कारणों से इन कारकों की कुशलता गिरने लगती है जिसके फलस्वरूप औसत परिवर्तनशील लागत बढ़ने लगती है। पृष्ट B 103 पर दी गयी सारणी के कालम 7 से स्पष्ट है कि चार इकाई तक AVC घट रही है किन्तु इसके पश्चात् यह बढ़ रही है। औसत परिवर्तनशील लागत वक्र ‘U’-आकृति लिये होता है।

औसत कुल लागत या औसत लागत (Average Total Cost or Average Cost) : औसत कुल लागत ज्ञात करने के लिये कुल लागत में कुल उत्पादन-मात्रा का भाग दिया जाता है। इसे औसत स्थिर लागत और औसत परिवर्तनशील लागत का योग करके भी ज्ञात किया जा सकता है। उत्पादन-मात्रा के बढ़ने पर प्रारम्भ में औसत कुल लागत घटती है और फिर एक सीमा के पश्चात् यह बढ़ने लगती है। चूँकि औसत कुल लागत औसत स्थिर लागत और औसत परिवर्तनशील लागत का योग होती है तथा उत्पादन के बढ़ने पर औसत स्थिर लागत लगातार घटती जाती है जबकि औसत परिवर्तनशील लागत प्रारम्भ में (लागत हास नियम की क्रियाशीलता के कारण) तो घटती है लेकिन बाद में (लागत वृद्धि नियम के क्रियाशील होने पर) बढ़ने लगती है, अतः जब तक औसत परिवर्तनशील लागत घटती है तब तक तो औसत कुल लागत भी घटेगी किन्तु जब औसत परिवर्तशील लागत बढ़ती है तो औसत कुल लागत तब तक घटती जायेगी जब तक कि औसत परिवर्तनशील लागत की वृद्धि औसत स्थिर लागत की कमी से कम होती है और जब इसकी वृद्धि औसत स्थिर लागत की कमी से अधिक हो जाती है तो औसत कुल लागत में भी वृद्धि होती जाती है। जिस उत्पादन स्तर पर औसत परिवर्तनशील लागत की वृद्धि औसत स्थिर लागत की कमी के बराबर हो, वही फर्म का इष्टतम उत्पादन-स्तर अथवा न्यूनतम लागत उत्पादन-स्तर होता है। किन्तु ध्यान रहे कि आदर्श उत्पादन स्तर पर औसत कुल लागत न्यूनतम होती है न कि औसत परिवर्तनशील लागत। इस बिन्दु पर औसत परिवर्तनशील लागत अपने न्यूनतम स्तर से अधिक होगी। इष्टतम उत्पादन-स्तर के पश्चात् उत्पादन में वृद्धि से औसत परिवर्तनशील लागत की वृद्धि औसत स्थिर लागत की गिरावट से अधिक होती है जिसके फलस्वरूप औसत कुल लागत बढ़ने लगती है। इन निष्कर्षों को पृष्ठ B 103 पर दी गयी सारणी के कालम 8 से प्रमाणित किया जा सकता है। औसत कुल लागत वक्र ‘U’-आकार का होता है।

सीमान्त लागत, औसत कुल लागत और औसत परिवर्तनशील लागत का सम्बन्ध

(Relationship between MC, ATC and AVC)

पृष्ठ B 103 पर दी हुई सारणी के विश्लेषण से स्पष्ट है कि इन लागतों के बीच निम्न सम्बन्ध पाये जाते हैं :

(1) उत्पादन में वृद्धि होने पर प्रारम्भ में औसत कुल लागत और सीमान्त लागत दोनों में कमी आती है किन्तु औसत कुल लागत की तुलना सीमान्त लागत में अधिक तेजी से गिरावट आती है। अतः जब तक औसत कुल लागत घटती रहेगी, सीमान्त लागत औसत कुल लागत से कम ही रहेगी। इसीलिये ही प्रारम्भ में ATC वक्र MC वक्र के ऊपर रहता है। पृष्ठ B 109 पर चित्र 6.2 में देखिये।

(2) जब तक सीमान्त लागत, औसत कुल लागत से कम रहती है तब तक औसत कल लागत घटती है किन्तु जब सीमान्त लागत, औसत लागत से अधिक हो जाती है तब औसत कुल लागत बढ़ने लगती है।

(3) जब औसतं कुल लागत बढ़ने लगती है तो सीमान्त लागत भी बढ़ती है किन्तु सीमान्त लागत की वृद्धि औसत कुल लागत से अधिक तीव्र होगी। यही कारण है कि औसत कुल लागत के बढ़ने पर सीमान्त लागत वक्र औसत कुल लागत वक्र के ऊपर रहता है। पृष्ठ B 109 पर चित्र संख्या 6.2 पर LT बिन्दु के बाद देखिये।

(4) सीमान्त लागत के पहले घटने और बाद में बढ़ने की दशा में यह उस बिन्दु पर औसत कुल लागत के बराबर होगी जिस पर औसत कुल लागत निम्नतम हो। दूसरे शब्दों में, उस. बिन्दु पर जहाँ सीमान्त लागत औसत कुल लागत के बराबर होती है, वहाँ औसत कुल लागत न्यूनतम होती है। चित्र 6.2 से स्पष्ट है कि ऐसा LT बिन्दु पर हो रहा है।

(5) शून्य उत्पादन स्तर पर औसत परिवर्तनशील लागत शून्य होती है लेकिन सीमान्त लागत अनिश्चित (indeterminate) होती है।

(6) जब सीमान्त लागत, औसत परिवर्तनशील लागत से कम होती है तो औसत परिवर्तनशील लागत घटती है तथा जब सीमान्त लागत, औसत परिवर्तनशील लागत से अधिक होती है तो औसत परिवर्तनशील लागत बढ़ती है।

(7) सीमान्त लागत के निम्नतम बिन्दु पर औसत परिवर्तनशील लागत निम्नतम होती है।

(8) उत्पादन में वृद्धि पर औसत कुल लागत में वृद्धि का बिन्दु सदैव ही औसत परिवर्तनशील लागत में वृद्धि के बिन्दु से बाद में आता है। इसका कारण यह है कि जब औसत परिवर्तनशील लागत अपने निम्नतम बिन्दु पर पहुँचती है तब औसत स्थिर लागत के नीचे गिरते जाने के कारण औसत कुल लागत का निम्नतम बिन्दु बाद में आता है।

(9) जब औसत कुल लागत और औसत परिवर्तनशील लागत दोनों बढ़ने लगते हैं तो इनमें एक-दूसरे के बहुत कुछ समान आने की प्रवृत्ति पायी जाती है किन्तु ये कभी भी. एक । दूसरे के बिल्कुल बराबर नहीं आ सकते क्योंकि औसत स्थिर लागत कभी शून्य नहीं हो सकती।

Short run Long run Cost
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अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन औसत लागत वक्रों में सम्बन्ध

(Relation between Short-run and Long-run Average Cost Curves)

1 SAC वक्र का सम्बन्ध केवल एक संयंत्र की कीमत से होता है जबकि LAC वक्र बहुत से SAC वक्रों के आधार पर बनाया जाता है।

2. यद्यपि LAC और SAC दोनों ही वक्र U-आकार के होते हैं किन्तु LAC वक्र SAC वक्र की तुलना में अधिक चपटा (flatter) तथा कम उग्र (less pronounced) होता है। दूसरे शब्दों में, दीर्घकालीन लागतें अल्पकालीन लागतों की तुलना में कम दर से घटती-बढ़ती हैं।

3. चूँकि LAC वक्र सभी SAC वक्रों को स्पर्श करता है, काटता नहीं है, अतः LAC कभी भी SAC से अधिक नहीं हो सकती है।

LAC वक्र की प्रबन्धकीय उपयोगिता

(Managerial Usefulness of LAC Curve)

प्रबन्धकीय निर्णयों में LAC वक्र की भूमिका अति महत्वपूर्ण होती है। इस वक्र के प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं :

(अ) उत्पादन के सर्वोत्तम आकार के निर्धारण में सहायक : इस वक्र की सहायता से प्रबन्ध उस उत्पादन-मात्रा को निर्धारित कर सकता है जिस पर उसकी औसत उत्पादन लागत न्यूनतम हो। ऐसा LAC वक्र के निम्नतम बिन्दु पर होता है।

(ब) संयंत्र के सर्वोत्तम आकार के निर्धारण में सहायक : जब किसी फर्म में कोई संयंत्र लगाना हो अथवा किसी पुराने संयन्त्र का विस्तार करना हो तो उस समय प्रबन्ध इस वक्र की सहायता से सर्वोत्तम आकार के संयन्त्र का निर्धारण करता है। ध्यान रहे कि दीर्घकाल में एक फर्म का हित एक दिये हुये संयन्त्र से न्यूनतम लागत पर उत्पादन प्राप्त करना नहीं होता वरन् उसका हित तो नियोजित उत्पादन-मात्रा को न्यूनतम लागत पर उत्पादन करने में पूरा होता है। यद्यपि एक फर्म के लिये अधिकतम लाभप्रद उत्पादन-मात्रा उसके अनुकूलतम उत्पादन बिन्दु पर होती है किन्तु व्यवहार में उसे अपने उत्पादन को माँग के अनुरूप समायोजित करने के लिये अनुकूलतम उत्पादन स्तर से कम या अधिक उत्पादन करना पड़ता है। इस उत्पादन-मात्रा के लिये उसके समक्ष विभिन्न आकार के वैकल्पिक संयंत्र हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में LAC वक्र सर्वोत्तम आकार के संयंत्र के चुनाव में प्रबन्ध की सहायता करता है। यह चुनाव निम्न प्रकार से होगा :

(1) अनुकूलतम उत्पादन स्तर से कम उत्पादन करना : इस स्थिति में फर्म के लिये अधिक मितव्ययी यह होगा कि वह एक छोटे आकार के संयंत्र पर उसके न्यूनतम लागत बिन्दु से अधिक उत्पादन (अर्थात् संयंत्र का अति प्रयोग) न करके किसी एक बड़े संयंत्र पर उसके न्यनतम लागत बिन्दु से कम उत्पादन (अर्थात् संयंत्र का कम प्रयोग) करे। ऐसा इसलिये होता है कि अनुकूलतम उत्पादन-स्तर से पूर्व फर्म को बड़े पैमाने के उत्पादन की बचतें प्राप्त होती हैं। जिससे फर्म में उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है। चूँकि एक बड़े संयंत्र पर एक छोटे संयंत्र की तलना में बड़े पैमाने के उत्पादन की अधिक बचतें प्राप्त होती हैं, इसलिये बड़े संयंत्र पर औसत उत्पादन लागत छोटे संयंत्र की अपेक्षा कम आती है। इसलिये इस स्थिति में बड़े आकार का संयंत्र अधिक मितव्ययी रहता है।

 (2) अनुकूलतम उत्पादन स्तर से अधिक उत्पादन करना : इस स्थिति में फर्म के लिये एक बड़े संयंत्र के उसके न्यूनतम लागत बिन्दु से कम उत्पादन करने (अर्थात् संयंत्र के कम प्रयोग) के स्थान पर एक कुछ छोटे संयंत्र का उसके न्यूनतम लागत बिन्दु से अधिक उत्पादन (अर्थात् संयंत्र का अति प्रयोग) अधिक मितव्ययी होगा। ऐसा इसलिये होता है कि अनुकूलतम उत्पादन स्तर के पश्चात् बड़े पैमाने के उद्योग के अपव्यय बढ़ जाते हैं और फर्म में उत्पत्ति हास नियम लाग हो जाता है। चूँकि एक छोटे आकार के संयंत्र पर अपव्यय बड़े आकार के संयंत्र की तुलना में कम होते हैं, इसलिये इस स्थिति में छोटे आकार के संयंत्र की औसत उत्पादन लागत बड़े आकार के संयंत्र की तुलना में कम रहती है और वह अधिक मितव्ययी रहता है।

रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण : बराबर Y में दिये चित्र 6.5 में फर्म को .A, B, C AID और D क्रमशः बढ़ते हुए आकार के चार .. संयंत्रों के बीच सर्वश्रेष्ठ संयंत्र का चुनाव : करना है। इन संयंत्रों के SAC वक्र क्रमशः AAI, BB1, CC, और DD, हैं। इन 8 वक्रों से स्पर्श करता हुआ खींचा गया वक्र LAC वक्र है। चित्र में फर्म की दीर्घकालीन । न्यूनतम औसत लागत PQ है। अतः 0Q फर्म का अनुकूलतम उत्पादन स्तर हुआ।

यद्यपि फर्म के लिये यही उत्पादन मात्रा (अर्थात् 00) सर्वोत्तम है किन्तु यदि फर्म के उत्पाद की बाजार में माँग अनुकूलतम उत्पादन स्तर OQ से कम होने के कारण उसे अपना उत्पादन घटाकर OQ करना पड़ता है तो इस स्थिति में फर्म के लिये A और B दो वैकल्पिक संयंत्र हैं। यहाँ पर फर्म के लिये A संयंत्र के अति प्रयोग के स्थान पर B संयंत्र का कम प्रयोग अधिक मितव्ययी रहेगा। जैसा कि उपर्युक्त चित्र से स्पष्ट है कि A संयंत्र पर OQ, उत्पादन-मात्रा की औसत लागत SQ है जबकि B संयंत्र पर यह SQ. है। चूंकि SQL से SQ. कम है, अतः इस उत्पादन-मात्रा के लिये B संयंत्र अधिक मितव्ययी होगा, यद्यपि इस संयंत्र की न्यूनतम उत्पादन लागत OQ, मात्रा से कुछ अधिक उत्पादन करने पर आती है।

इसी तरह यदि फर्म को उत्पादन OQ से बढ़ाकर OQ2 करना पड़ता है तो उसके लिये इस उत्पादन मात्रा के लिये उपलब्ध C और D संयंत्रों में से D संयंत्र के कम प्रयोग के स्थान पर C संयंत्र का अति प्रयोग अधिक मितव्ययी होगा। उपरोक्त चित्र में C संयंत्र पर OQ, मात्रा की औसत उत्पादन लागत TQ2 है जबकि D संयंत्र पर इस मात्रा की औसत उत्पादन लागत T,Q, है। चूंकि TQ, से TIQ, अधिक है। अतः इस स्थिति में C संयंत्र का अति प्रयोग अधिक मितव्ययी रहेगा।

संक्षेप में, दीर्घकालीन अनुकूलतम (अथवा इष्टतम) स्तर से कम उत्पादन के लिये यह अधिक लाभदायक होगा कि कुछ बड़े संयंत्र को उस उत्पादन क्षमता से कम प्रयोग किया जाय जिस पर उत्पादन न्यूनतम लागत पर होता है। इसके विपरीत दीर्घकालीन इष्टतम स्तर से

अधिक उत्पादन के लिये यह लाभदायक होगा कि एक छोटे संयंत्र को अधिक क्षमता पर प्रयोग किया जाये।

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